
स्वामी विवेकानंद विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय भारतीयों में से एक हैं। गांधी जी और अब नरेंद्र मोदी ही उनको इस विषय में स्पर्धा दे सकते हैं। स्वामीजी ने विश्व मंच पर भारत की अमिट छाप तब छोड़ी जब भारत परतंत्र था। ईसाई मतप्रचारकों ने पूरे विश्व में हिंदू जीवन का विभत्स दुष्प्रचार किया था। विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक जीवनशैली, संस्कृति और उपासना पद्धति को अपने अज्ञान और स्वार्थ हेतु अंधविश्वास, जादूटोना तथा कुरीतियों के रूप में प्रचारित किया गया था। इस सब का उद्देश्य मतपरिवर्तन हेतु धनसंग्रह करना यही था।
स्वामीजी को भी पंथ सभा के पूर्व के डेढ़ माह के अमेरिका वास्तव्य में इन भ्रमों का सामना करना पड़ता था। अनेक विचित्र प्रश्न उनसे पूछे जाते थे। उस समय जिस साहस से स्वामी विवेकानंद ने सनातन का प्रचार किया वह अतुलनीय है। शिकागो की सर्व पंथ सभा ईसाईयों द्वारा अपने मत को औरों से श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए आयोजित की गई थी। प्रमुख आयोजक फादर बेरोज एक बैप्टिस्ट मत प्रचारक पादरी थे। सर्व पंथ सभा के आधिकारिक सूचना पत्र पर ही सभा के उद्देश्य के बारे में लिखा था कि विश्व के सभी मत-पंथों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर उनके सम्मुख ईसाई मत की श्रेष्ठता को निर्विवाद रूप से सिद्ध करना। स्वामीजी ने अपने सम्मोहित करते वक्तृत्व और अकाट्य तर्कों द्वारा न केवल हिंदू धर्म और संस्कृति की महानता का परिचय श्रोताओं को दिया अपितु सभी उपासना पद्धतियों के सम्मान की आवश्यकता को भी सुप्रतिपादित किया। सभा के उद्घाटन में ही स्वागत को उत्तर देते हुए दिये गये उनके वक्तव्य ने बंधुत्व का आध्यात्मिक आदर्श विश्व के सम्मुख प्रस्थापित किया। सर्वसमावेशकता के हिंदू सिद्धांत के बारे में उनका गर्वोन्नत वचन – “अन्य पंथों को हम केवल सहन (tolerate) नहीं करते अपितु सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।” – अमेरिका के विद्वानों की आँखें खोल गया।

एक ही दिन में स्वामीजी समाचार पत्रों में छा गये। उनके तेजस्वी छायाचित्र नगर में पट गये। The Hindoo Monk Of India, रातोंरात अमेरिका में सर्वाधिक लोकप्रिय नायक बन गये। पत्रकारों ने लेख लिखे कि ऐसे विद्वान जिस धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं उस देश को पिछड़ा कह उन्हें सभ्य बनाने के लिये मतप्रचारक भेजना और दान देना निरर्थक है। इन्हें सिखाना मूर्खता है, इनसे तो हमें सीखना है। जो जो स्वामीजी के सम्पर्क में आया, उनकी अद्भुत प्रतिभा और विद्वत्ता से प्रभावित होने के साथ ही हिंदुत्व के प्रति आकर्षित हुआ। वास्तविक अर्थों में स्वामी विवेकानंद में भारतमाता को विश्वगुरु के रूप में पुनःस्थापित कर दिया।

भारत में लौटने के बाद भी पूरे देश में लगातार भ्रमण कर सुप्त राष्ट्र को जागृत करने का कार्य स्वामीजी ने किया। कुल 39 वर्ष 6 माह और 18 दिन के जीवन में से विवेकानंद के रूप में 1886 से 1902 तक केवल 16 वर्ष के जीवन में स्वामीजी पूरी मानवता के लिए अद्भुत कार्य कर गये। किंतु जितना उन्होंने किया उससे अधिक की प्रेरणा, सिद्धांत एवं स्पष्ट संकेत अपने व्याख्यानों तथा पत्रों में छोड़ गये हैं। आज उनके 160 वे जन्मदिन पर इस बात का अवलोकन करना होगा कि उनकी समाधि के 120 वर्ष बाद भी क्या इन बातों में कुछ प्रगति हुई है? 1988 में एक अमेरिकी लेखिका एलेनॉर स्टार्क ने पुस्तक लिखी – Gift Unopened – New American Revolution. इस पुस्तक में वे तर्क करती हैं कि 100 वर्ष पूर्व स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका को वेदांत का उपहार प्रदान किया था जो उस भूमि में सकारात्मक क्रांति ला सकता था। किंतु जैसे शुभ प्रसंगों पर प्राप्त उपहारों में से कुछ बिना खोले ही रह जाते हैं, वैसे ही स्वामी जी की अनमोल शिक्षा का उपहार भी अमेरिका ने खोला ही नहीं। लेखिका का कहना था कि यदि अब भी अमेरिका इस उपहार के मूल्य को जान उसे खोलकर स्वीकार करते हैं तो वहाँ दूसरी क्रांति आ सकती है।
स्वामीजी द्वारा ‘उदात्त हिंदू जीवनदृष्टि और भारत के लिए महान लक्ष्य’ का दिया अनुपम उपहार क्या भारतीयों द्वारा आवृत्त ही छोड़ दिया है? उनके निर्वाण के 120 वर्षों के बाद भी क्या हम उनके सभी आदर्शों पर कार्य कर पाये हैं? आइये विश्लेषण का प्रारंभ उन बातों से करते हैं जो हमने ठीक से समझी और जीवन में कुछ हद तक उतारी भी हैं। स्वामीजी कहा करते थे कि ‘त्याग और सेवा हमारे राष्ट्रीय आदर्श हैं।’ ईसाई मिशनरियों द्वारा सेवा के बहाने मतांतरण के षडयंत्र की काट के रूप में हिंदुओं द्वारा संस्थागत सेवा का उपाय स्वामीजी ने स्वयं आचरण से बताया था। रामकृष्ण मठ के साथ ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना सेवा के संस्थागतीकरण के लिए ही हुई थी। नाम में ही उद्देश्य स्पष्ट था। आज हिंदू समाज ने सेवा का व्रत इतने बड़े रूप में ले लिया है कि विश्व में सर्वाधिक सेवा कार्य हिंदू समाज ही कर रहा है। केवल इस संबंध में स्वामीजी द्वारा सुस्पष्ट दो विषय आज भी अपूर्ण हैं और आवृत उपहार की सूची में रखे जा सकते हैं। एक तो सेवा का स्वभाव बन जाना। संस्थागत सेवा प्रकल्पों के साथ ही प्रत्येक सनातनी के जीवन में स्वभावगत सेवा यह जो हिंदू जीवनपद्धति का प्रमुख अंग रहा है वह अभी भी अतिदूर दिखता है। संस्थाओं को केवल आर्थिक दान से पंचमहाऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। सेवा प्रकल्पों के साथ ही सेवा प्रबोधन अभियान भी आवश्यक है।

दूसरा अपूर्ण विषय है सेवा द्वारा मतांतरण को रोकना। यह अप्रत्यक्ष तो बड़े प्रमाण में हो रहा है किंतु मुख्य उद्देश्य के रूप में इसकी अनिवार्यता स्वभावतः सहिष्णु हिंदू के मन में आज भी स्पष्ट नहीं है। दृढ़ से दृढ़ सनातनी भी इस बारे में खुलकर बात नहीं करता। किसी द्वारा करने पर विरोध करनेवाले भी हिंदू ही होते हैं। ‘मतांतरण से केवल एक हिंदू कम होकर ईसाई या मुसलमान की संख्या में वृद्धि नहीं होती है अपितु एक शत्रु बढ़ता है।’ यह स्वामीजी का स्पष्ट वचन किसी भावपूर्ण भाषण के आवेश में कहा हुआ नहीं है, रामकृष्ण मिशन के न्यास अभिलेख (Trust Deed) में लिखा सुविचारित उद्देश्य है। आज अनुभव से म्यांमार के बौद्ध साधु भी मुखर हो गये हैं किंतु अधिकतर हिंदू धर्माचार्यों और सेवा संस्थाओं में आज भी इस आक्रमण की भयावहता स्पष्ट नहीं है। इस कारण सेवा का मिशन अभी अपूर्ण आवृत्त उपहार ही है।
स्वामीजी के एक और उपहार पर अच्छा कार्य हुआ है – संगठन। हिंदुओं द्वारा संगठन सूत्र को भुलाने के बारे में भारतीय व्याख्यानों में स्वामीजी ने कठोर भर्त्सना की है। केकड़ों के समान ईर्ष्या से टांग खिंचाई की गंभीर आलोचना की है। पश्चिम से संगठन का मंत्र सीखने को बार-बार कहा है। उन्होंने केवल उपदेश ही नहीं दिया अपितु संन्यासी संगठन की नींव रखकर उदाहरण भी प्रस्तुत किया। स्वयं के मोक्ष हेतु संसार का त्याग करनेवाले संन्यासियों को “आत्मनो मोक्षार्थं। जगत्हिताय च॥” स्वयं के मोक्ष के साथ ही जगत के हित के लिए, ऐसा उदात्त ध्येय प्रदान कर संगठनबद्ध किया। संन्यासिनियों के संगठन का भी लक्ष्य रखा जो बाद में 1952 में रामकृष्ण शारदा मठ के रूप में साकार हुआ। स्वामीजी की प्रेरणा से भारत में धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक संगठनों की बाढ़ आ गई। आज इस एक उपहार का भारत में पूर्ण आदर और अनुपालन हुआ है। स्वामीजी ने कहा था अनेक रंगों की ध्वजपताका लिए अनेक संगठन कार्य करें और परस्पर समन्वय से इन सब रंगों के इंद्रधनुष से शांति का शुभ्र रंग प्रकाशित हो। आज राजनीतिक संगठनों को छोड़ अन्य सभी क्षेत्रों में विविध संगठनों का अद्भुत समन्वय दिखाई दे रहा है।
अब उन उपहारों पर विचार करते हैं जिनका आवरण अभी उतारा नहीं है भारत ने। 1893 की सर्व पंथ सभा में स्वामीजी के बंधुत्व संदेश ने हिंदू धर्म की ध्वजपताका विश्व मंच पर गर्व से उन्नत की। यह भारत के विश्वगुरु बनने का शुभारंभ था। उसके बाद अनेक गुरु, धर्मप्रचारक विदेश जाकर अनुयायी बनाते रहे किंतु पूर्ण वैज्ञानिक सैद्धांतिकता से वेदान्त को विश्वमान्य सार्वजनीन धर्म बनाने का स्वामीजी का उपहार अभी भी दुष्प्राप्य ही दिखता है। योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता तो प्राप्त हुई है किंतु उसे सेक्युलर विज्ञान के रूप में रोगनिवारक शारीरिक चिकित्सा ही माना जा रहा है किंतु उसके आध्यात्मिक धार्मिक पक्ष को पूर्णतः नकारा जा रहा है। अतः यह उपहार अभी अनावृत्त होना बाक़ी है।
सर्व पंथ समन्वय के लिए एकत्व की अनुभूति द्वारा परस्पर सम्मान और अच्छे सिद्धांत और व्यवहारों को सीखने का एकमात्र रामबाण उपाय स्वामीजी ने प्रतिपादित किया था। सेक्युलॅरिज्म के खोखले शीर्षक से चल रहे तुष्टिकरण के कारण सर्वसमावेशकता और विविध आध्यात्मिक प्रयोगों की भूमि भारत में ही आज यह उपहार दुर्लक्षित है और उसी कारण पूरे विश्व में ही आतंक और रूढ़िवादी हाहाकार फैला हुआ है।

निकोला टेस्ला जैसे वैज्ञानिकों के साथ स्वाध्याय से उपनिषदों के विज्ञान द्वारा आधुनिक भौतिकादि शास्त्रों को पुष्ट करने का कार्य स्वामीजी ने 1894 में ही प्रारंभ किया था। स्वामीजी ने ही टेस्ला को बताया था कि जड़ द्रव्य और ऊर्जा एक ही है। यह ऐसा समय था जब भौतिक शास्त्र ऊर्जा और जड़ जगत को पूर्णतः भिन्न मानता था। आकाश तत्व का ज्ञान भी विज्ञान को नहीं था। रिक्त स्थान में ईथर नामक काल्पनिक द्रव्य को मानकर ही भौतिकी के नियम बनाए जा रहे थे। तब स्वामीजी ने टेस्ला को उपनिषद के अत्युच्च सिद्धांत ‘किसी भी वस्तु को प्रकाश की गति से प्रक्षेपित करने पर वह प्रकाश बन जाती है’ का परिचय करवाया। निकोला टेस्ला ने अपने सिद्धांत भौतिकी के शोध पत्र में स्वामीजी को उद्धृत किया। उन्होंने ‘मिस्टर कानंद’ ऐसा उल्लेख किया, संभवतः उन्हें vive प्रथम नाम और kanand उपनाम लगा होगा। इसके लगभग दो दशक बाद आइन्स्टाइन ने अपने जिस शोध पत्र में ऊर्जा और जड़ के रूपांतरण का सूत्र E=MC2 दिया उसमें टेस्ला के उसी शोध पत्र का संदर्भ दिया था जिसमें स्वामीजी का उद्धरण था। जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्लचंद्र रे आदि अनेक वैज्ञानिकों ने स्वामीजी से प्रेरणा प्राप्त कर भारतीय सिद्धांतों को भौतिकी, रसायन तथा जीवशास्त्र में आधुनिक विज्ञान को प्रदान किया। वनस्पति और तत्पश्चात् धातु में प्राण होने का सिद्धांत जगदीश बसु ने स्वामीजी की प्रेरणा से ही किया था। रसायन में एक मूल द्रव्य, भौतिकी में एकीकृत बल तथा जीव शास्त्र में एक सर्वव्यापी प्राण के सिद्धांत को उन-उन शास्त्रों के चरम अन्वेषण के लक्ष्य के रूप में स्वामीजी ने उन्नीसवी सदी के अंतिम वर्षों में ही प्रतिपादित कर दिया था। आज भी यह आधुनिक विज्ञान को अप्राप्य रहस्य है। किसी भारतीय ने ही इस पर पूरी श्रद्धा और लगन से कार्य करना चाहिए था किंतु यह उपहार अभी भी आवृत्त ही है। भारतीय विज्ञान में अनुसंधान हेतु गठित टाटा विज्ञान अनुसंधान संस्थान जो बाद में IISC बंगलोर के नाम से कार्यरत है, वह भी आज केवल पश्चिम की दृष्टि से ही अध्ययन कर रहा है। स्वामीजी की मूल प्रेरणा तो अनावृत्त हुई ही नहीं।

जापान से कनाडा जाते समय जहाज पर जमशेदजी टाटा स्वामीजी के साथ थे। वही पर उनकी चर्चा लोह उत्पादन पर हुई। टाटा जापान की तकनीक से लोह उत्पादन हेतु जापान में उद्योग लगाने का विचार कर रहे थे। स्वामीजी ने उन्हें भारत के उन्नत धातुशास्त्र के इतिहास का परिचय दिया और उस दिशा में भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा में अनुसंधान के लिए प्रेरित किया था। जिसका उल्लेख और नियति की व्याख्या ऊपर की गई है। भारतीय ज्ञान परंपरा में परिपूर्ण गवेषण का उपहार भी अभी अनावृत्त ही है।

उसी के साथ स्वामीजी ने इस्पात उद्योग भारत में ही लगाने का आग्रह भी जमशेद जी को किया। आज भी लोह नगरी जमशेदपुर में टाटा ने स्वामीजी की प्रेरणा का उल्लेख किया है। यह उद्यम प्रेरणा और स्वदेशी की भावना राजनीतिक आंदोलनों में तो प्रदर्शित हुई किंतु उद्यमिता के विकास का यह उपहार आज भी आवृत्त ही है। आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य इसके अनावरण की संभावना को जगाता है किंतु ग्राम-ग्राम तक विकेंद्रित सर्वसुखकारी विकास संकल्पना से ही यह संपन्न होगा।
पूर्णता की अभिव्यक्ति करनेवाली मानव निर्माण तथा चरित्र गठन करनेवाली शिक्षा का भारतीय प्रादर्श भी अभी अनावृत्ति की प्रतीक्षा में ही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इस शिक्षा व्यवस्था के लक्षण तो अभिलेखित हुए हैं। किंतु यह उपहार भी नीति के समग्र एवं एकात्म क्रियान्वयन से ही प्रयोग करने योग्य अनावृत्त होगा।

समृद्धि व संस्कृति की समान उपासना करनेवाले विश्वगुरु भारत का स्वप्न यदि हम साकार करना चाहते हैं तो स्वामीजी के आवृत्त उपहारों का अनुसंधान कर उन्हें शीघ्र क्रियाशील बनाने का कार्य करना होगा। इस हेतु भी उनके युवा जागरण एवं कार्यकर्ता निर्माण के उपहार को खोलना होगा। सिंह समान साहसी, नचिकेता से श्रद्धावान, हनुमान से महावीर, पूर्ण समर्पित 100 युवाओं की खोज स्वामी विवेकानंद को थी। उनके अल्प जीवन में तो यह सूची पूर्ण नहीं हो सकी। क्या आप उस सौ में से एक हैं? आइए, अपने अंदर की अनंत शक्ति के उपहार को जाने, खोले और प्रयोग में लाए। अपने जीवन को भारतमाता को समर्पित करें।

नमस्कार
जैसे कहा है कि कई बाते अनावृत है उन्हें आवृत करना बहोत ही आवश्यक है, अनुसंधान, शिक्षा, संपूर्ण व्यक्तित्व विकास , युवाओं को आवृत करना होगा।