आइये अपने भीतर के अर्जुन को जगाएं !

Mukul Kanitkar 5 मिनट का पठन

bibhishanधर्म अधर्म का युद्ध शाश्वत है| यह महाभारत हर काल में लड़ा जाता है | व्यक्तिकेंद्रित विचार करनेवाले स्वार्थी अपने निजी हितों, स्वार्थों के लिए कौरव सेना में एकत्र आ जाते है | उदात्त विचार और चरित्र के धनी भीष्म पराक्रमी भी अपने व्यक्तिगत प्रतिज्ञा में बंधे प्रतिष्ठा के दास बन जानबूझकर अधर्म की सेना में सम्मिलित हो जाते है | उपकारों के मायावी बोझ के टेल दबे गुरु मन से धर्मराज को आशीर्वाद देते हुए भी अपनी छद्म निष्ठा के चलते चक्रव्यूह रचते है | उधर धर्म की और से लड़नेवाली सेना में भी व्यक्तिगत आकाँक्षाओं, प्रतिज्ञाओं, प्रतिशोधों का व्यापर है ही | सब एकमन से एक लक्ष्य को लेकर लड़ रहे हो ऐसा नहीं होता | फिर भेद क्या? क्यों पांडवों का पक्ष धर्म का और कौरवों का अधर्म का ?? अन्याय का प्रतिकार कर रहे इसलिए? द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध ले रहे इसलिए? अपनी न्यायोचित भूमि को पाने के लिए युद्ध कर रहे इसलिए?? नहीं …..
पांडव पक्ष को धर्म पक्ष बनाता है केवल एक सारथी — कृष्ण | उसका धर्म सन्देश कुरुक्षेत्र के बांधव भेद को धर्मयुद्ध में परिवर्तित कर देता है | Bhagawad Gitaमहाभारत के युद्धारम्भ में यदि गीता न होती तो ये भी केवल दो भाइयों का कुल-संघर्ष ही रह जाता | गीता का कर्मोपदेश धर्म्स्थापना का चिरंतन सन्देश है | यदि गीता हमारे साथ है तो हमारे समस्त व्यक्तिगत उद्देश्य उदात्त बन जाते है | हम धर्मस्थापना के उपकरण बन जाते है | गीता का सार उसके पहले और अंतिम शब्द में छिपा है | गीता का प्रथम श्लोक युद्ध का मूल कारण जिसका पुत्रमोह बना उस धृतराष्ट्र के मुख से है – धर्म क्षेत्रे कुरु क्षेत्रे … | प्रथम शब्द है धर्म | गीता का अंतिम श्लोक ज्ञात इतिहास के प्रथम दूरदर्शी संवाददाता संजय का कहा है – यत्र योगेश्वरो कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धरः | तत्र श्री विजयी भूति धृवा नीतिर्मतिर्मम || अंतिम शब्द हुआ मम | गीता का विषय है – मम धर्म | मेरा धर्म – स्वधर्म | किसी भी परिस्थिति में क्या करणीय है यह गीता बताती है | व्यक्तिकेंद्रित विचार से समष्टिगत विचार की और प्रेरित कर धर्म मार्ग का मार्गदर्शन गीता कराती है |
विश्व में जो कुछ भी अस्तित्व में आया है उसका उद्देश्य होता है | निर्जीव मानव निर्मित वस्तुओं के इ निर्माण का उद्देश्य होता है | महँगी से महँगी कार भी केवल स्वयं के वाहन का साधन नहीं है | वह चालक व यात्रियों को गंतव्य में पहुचने के लिए बनी है | कुर्सी किसी और को आराम पहुँचाने का कार्य करने के लिए बनायीं गयी | स्वयं नहीं आराम करती | जब इन वस्तुओं का निर्माण भी औरों की सेवा के लिए है, उनके अस्तित्व का उद्देश्य परहित है तब जीवितों में अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मानने वाला मानव स्वार्थी कैसे हो जाता है?? यह स्वबोध के आभाव के कारण है | गीता के प्रारंभ में अर्जुन इसी रोग से पीड़ित है | युद्ध को अपने व्यक्तिगत हित का साधन समझाने के मोह (भ्रम) के IACकारण अपनों को मरने के शोक से विषद ग्रस्त हो जाता है | पूरी गीता में कृष्ण ने उसे अपने कर्तव्य की ओर प्रेरित किया है | स्व-धर्म का बोध यही है | समष्टि की ओर व्यक्ति का कर्तव्य | जब यह बोध हो जाता है तब कोई मोह नहीं होता | भय और शोक का मूल भ्रम में है | भगवान ने गीता में अनेक प्रकार से इस धर्म का मार्गदर्शन किया है | अर्जुन को निमित्त बना कृष्ण ने पूरी मानवता को ही जीवन जीने का मार्ग बताया है |
वर्तमान समय में सारा विश्व ही अपने स्वबोध के बारे में भ्रम में है | बाह्य चकाचौंध से बाधित दृष्टि के कारण अपने सत्य परिचय को खो बैठा है | सारे कष्ट, तनाव, अपराध, हिंसा, साम्प्रदायिकता, आतंक, लूट के मूल में यह स्व-भ्रम (Identity Crisis) है | व्यक्ति स्वयं से ही भाग रहा है | divyam dadami thay chakshuउपासना में भी आडम्बर का बढ़ता महत्त्व इसी पलायन का द्योतक है | अब्राहम के वंशजों द्वारा प्रसारित रिलिजन तो केवल संख्या व राजनयिक प्रभाव की वृद्धि के लिए सतत संघर्ष को ही धर्म युद्ध मान कई शतकों से मानव रक्त को बहा रहे है | पर्यावरण को भी भोग का साधन मानने की भूल इसी स्वभ्रम के कारण है | यह सब धरती को निरर्थक विनाश की ओर ले जा रहा है | विनाश तो महाभारत में भी हुआ | पर निरर्थक नहीं | गीता ने युद्ध को सार्थकता को प्रदान की | इसीलिए युद्ध के बाद धर्मस्थापना हुई और सदियों तक सर्व-सुखकारी शांति की प्रतिष्ठा भी |
गीता आज भी जीवित है | योगेश्वर कृष्ण आज भी हम सब को मार्गदर्शन देने के लिए तत्पर है | क्या हम अर्जुनत्व जगाने को तैयार है ? दुसरे अध्याय के सातवे श्लोक में अर्जुन शिष्यत्व ग्रहण करता है | शिष्यस्तेहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं | अपने दोषों को स्वीकार कर शिष्यत्व ग्रहण करने से गीता प्रगट होगी | क्या हम इसके लिए तैयार है??

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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