उत्तिष्ठत! जाग्रत!! – नचिकेता की श्रद्धा

Mukul Kanitkar 6 मिनट का पठन

गढ़े जीवन अपना अपना -11
मृत्यु का सामना करने के लिये बड़ा उत्साह चाहिये। साधारणतः मृत्यु को तो भय के साथ ही जोड़कर देखा जाता है और यहाँ उत्साह की बात कही जा रही है। श्रद्धा ऐसे ही चमत्कार करने में सक्षम होती है। आत्मावलोकन के समान ही उत्साह श्रद्धा का ही परिणाम भी है और अंग भी। नचिकेता तो यम के स्थानपर जाने के लिये उत्सुक है। उसका उत्साह बालक की जिज्ञासा की तरह है जो हर नये अनुभव से ज्ञान प्राप्त करना चाहता है बिना किसी भय अथवा गणित के। नचिकेता के लिये मृत्यु के द्वार जाना नई अनुभूति के ज्ञान का अवसर था। अतः उत्तेजना भी है, उमंग भी और जिज्ञासा भी।
हमारे क्रांतिकारियों के बारे में भी ऐसा ही बताते है। चाहे कांकोरी काण्ड के आरोपी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, राजेन्द्र लाहीडी, शचिन्द्रनाथ सान्याल हो या बाद में भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त और सुखदेव, राजगुरु सदैव उत्साह में ही रहते थे। मृत्यु की चिंता उन्हें कभी नहीं सताती थी। यह मन मस्त फकीरी अपने कार्य और भारतमाता के प्रति उनकी श्रद्धा का परिणाम ही थे। किसी भी शारीरिक यातना से अंग्रेज उनके मन को नहीं तोड़ सकें। बेड़ियाँ तालवाद्य बन गई और कोठरी की सलाखें मृदंग। ‘रंग दे बसंती चोला’ और ‘वन्दे मातरम्’ के तराने जेलों में अन्य अपराधियों को भी देशभक्त बनाने लगे। यमराज को चुनौती देता यह उत्साह फांसी के फंदे पर भी नहीं थमा।
अण्डमान के काले पानी की काल कोठरी भी सावरकर के उत्साह को न ड़िगा सकी। वहाँ उस भीषण यमनर्तन में जहाँ उनकी कोठरी के सामने रोज कोई ना कोई मारा जाता, कोई आत्महत्या कर देता, कोई रोग का बलि पड़ता; वह वीर काव्य की रचना करता। जेलर बारी यातना देते देते थक गया। सावरकर ने बेड़ियों की संकेतभाषा का निर्माण कर दिया। सारे सूल्यूलर जेल में संदेशवहन होने लगा। एकसाथ हड़ताल हुई। श्रद्धा से सराबोर उत्साह मृतप्राय लाशों में भी जान फूँक देता है। सावरकर ने कागज कलम की व्यवस्था जुटाई और अण्डमान से लंडन पत्राचार किया। क्रूरकर्मा बारी पर कारवाही हुई उसका तबादला हुआ। श्रद्धा की विजय हुई। ये सारे नचिकेता ही तो थे।
उत्साह किसी भी परिस्थिति में निराशा को नहीं पास फटकने देता। जब नचिकेता यम के द्वार पहुँचा तो यमराज नहीं थे कही गये हुए थे। नचिकेता ना तो निराश हुआ ना ही लौट आया। तीन दिन और रात यम की प्रतिक्षा करता रहा। ना थका ना ही उसका मन ऊबा। वैसे भी जिनके मन श्रद्धा से भरे हो वो हताश कैसे होंगे। ऊबने का तो नाम ही नहीं। आजकल हम छोटे छोटे बच्चों के मुखसे बोर होने की बात सुनते है। ये ऊबना मानसिक रिक्तता का लक्षण है। उत्साही ना तो स्वयं ही ऊबता है ना अपने परिवेश में किसी को ऊबने देता है। यमराज जब लौटे तो नचिकेता की श्रद्धा और लगन से प्रसन्न हुए और तीन दिन के लिये उसे तीन वर प्रदान किये।
नचिकेता ने वरदान में जो मांगा है वह हमे श्रद्धा के तीसरे आयाम पर ले आता है –वैराग्य! वैराग्य से ही श्रद्धा का जन्म होता है। वैराग्य का अर्थ है विस्तार। छोटे स्वार्थ का त्याग। नचिकेता के तीनों वर देखिये। पहला वर मांगा अपने पिता के लिये, ‘पिता के पाप नष्ट हो और उनका क्रोध शांत हो।’ परिवार के कुशल एवं धर्म की रक्षा की ईच्छा से मांगा वरदान। दूसरा वर सारी मानवता के कल्याण के लिये, ‘ऐसा यज्ञ बताये जिसको करने से पृथ्वि पर ही स्वर्ग का अलौकिक सुख सब प्राप्त कर सके।’ यमराज ने दोनों वर प्रदान किये। दूसरे वर में जो यज्ञ का वर्णन है वह आज की समस्त पर्यावरण की समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकता है।
तीसरे वर के रुप में नचिकेता ने सर्वोच्च ज्ञान की आकांक्षा की। मृत्यु के रहस्य का ज्ञान-आत्मज्ञान। मरने के बाद व्यक्ति का क्या होता है? मृत्यु से अधिक अच्छा यह कौन बता सकता है। यह है वैराग्य की चरम सीमा। यमराज ने अनेक प्रलोभन दिये। और कुछ मांग लो धन, राज्य, दीर्घायु, दास दासी, आरोग्य सब देने को तैयार थे यमराज पर नचिकेता तो अपनी मांग पर अडे थे। आत्मज्ञान ही चाहिये। यह दृढ़ता वैराग्य से उत्पन्न श्रद्धा से ही सम्भव है। वैसे सामान्यतः हम लोग वैराग्य का अर्थ सन्यास से लगाते है। और जीवन में जिसे सब पाना है उसे वैराग्य की बात बताने से असम्भव भी लगता है और भय भी लगता है। मै तो जीवन का आनन्द लेना चाहता हूँ। सब सुख भोगना चाहता हूँ। ख्याति पाना चाहता हूँ। ये वैरागी थोड़े ही बनना है। पर मजेदार बात यह है कि ये सब तो वैराग्य के ही फल है।
वैराग्य का अर्थ है मन का विस्तार। छोटा संकुचित मन छोटी ही आकांक्षा कर पाता है। मन जब अपने बड़े विस्तारित अस्तित्व के साथ जुड़ जाता है तब उसका स्वार्थ भी विस्तारित होता है। परिवार मेरा ही विस्तारित रुप है। मन जब बड़ा होता है तो समझता है ‘मै ही परिवार हूँ।’ और विस्तार होने पर समझता है कि ‘मै ही समाज हूँ।’ वैराग्य की दुढ़ता के साथ ही यही विस्तार राष्ट्र के स्तर पर पहुँच जाता है। फिर स्वामी रामतीर्थ कह उठते है, ‘मै ही भारत हूँ।’ भारत की संस्कृति अपनी संवेदना में समूची मानवता, प्राणीमात्र, प्रकृति, ब्रह्माण्ड और परमात्मा को समेटे हुए है। इसिलिये हम सब के सुख की प्रार्थना करते है। सर्वे भवन्तु सुखिनः। इसलिये भारत तक जिसका विस्तार हो गया उसे परम वैराग्य प्राप्त हो गया। यही हमारे क्रांतिकारियों के निर्भय मृत्युगान का रहस्य है। वैराग्य तो महास्वार्थ है। या कहे परम स्वार्थ।
एक और बात जब हम अपने महास्वार्थ का ध्यान देते है तो छोटे मोटे स्वार्थ तो अपने आप ही पूर्ण हो जाते है। भारत के लिये काम करनेवाले का स्वयं का सम्मान तो बढ़ता ही है ना? भारत की जीत में ही हम सब की विजय है।
नचिकेता को भी अपनी श्रद्धा का फल मिला। यमराज ने मृत्यु के परे का ज्ञान तो दिया ही साथ ही प्रलोभन के रुप में दिये सभी आश्वासन भी ‘तथास्तु’ कर दिये। आत्मावलोकन, उत्साह और वैराग्य से उपजती है श्रद्धा और इस श्रद्धा से प्रेरणा, वीरता, ध्यैर्य और विवेक इन आंतरिक उपकरणों का विकास होता है और प्राप्त होती है निश्चित सफलता और जीवन की सार्थकता।
यमराज ने नचिकेता को कहा ‘शूरस्य धारा निषिधा दूरत्यया। दूर्गम पथस्तत कवयो वदन्ति’ तलवार की धार पर चलने जैसा दूर्गम यह पथ है ऐसा ज्ञानी बताते है। पर पहले मन्त्र में वे उपाय बता चुके हैं। जो स्वामी विवेकानन्द का महामन्त्र बना, ‘उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्य वरान् निबोधत!’ यमराज ने कहा उठो जागो वरीष्ठ जनोंसे मार्गदर्शन प्राप्त करों। स्वामीजी ने सिंहनाद किया, उठो ! जागो! लक्ष्यप्राप्ति तक रूको नहीं।’

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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3 Comments

  1. आप इसी प्रकार सभी कार्यकर्ताओ का ज्ञानवर्धन करते रहेंगे ऐसी हमेशा आपसे अपेक्षा है|

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