शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है। यह गीत स्वयंसेवी संगठनों पर पूर्ण साकार है। जिस भी उदात्त ध्येय के लिए संगठन कार्य करता हो उस ध्येय के प्रति समान निष्ठा के कारण कार्यकर्ताओं में जो मैत्री संबंध बनते हैं वे कई बार रक्त के संबंधों से भी अधिक दृढ़ होते हैं। निःस्वार्थता ही प्रेम का मूल है। जब तक ‘मैं’ की भावना है तब तक प्रेम नहीं हो सकता। जब मैं से अधिक दूसरे का विचार होने लगता है तब वह दूसरा अपना हो जाता है। यह एकात्मता ही प्रेम है। ध्येय की उदात्तता उसके निःस्वार्थ होने में ही है। अतः कार्यकर्ता अपने स्वार्थ से संगठन से भले ही जुड़े, क्रमशः संपर्क, संवाद, सूचना की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते कब निःस्वार्थ संबंध में जुड़ जाता है यह उसे स्वयं भी पता नहीं चलता। उसे इस शुद्ध सात्विक प्रेम में जोड़ने वाले ज्येष्ठ कार्यकर्ता भी अनायास इन्हीं सोपानों को चढ़े होते हैं। पूछने पर यह बता पाना असम्भव ही होगा कि कब वे समर्पण के उस स्तर पर पहुँच गए जब संगठन, ध्येय के साथ एकात्म हो गए। इस सबका माध्यम तर्कपूर्ण विचार, चर्चा, प्रेरक उद्बोधन आदि ना हो कर कार्यकर्ताओं का निर्व्याज्य प्रेम ही होता है।
संगठन सूत्र के ‘स’कारात्मक सोपानों में चतुर्थ है संबंध। यह सुनियोजित नहीं हो सकता, सहज ही होता है। संबंध उस बंधन को कहते हैं जो बाँधने के स्थान पर मुक्त करता है। सम्यक् बन्ध अर्थात् अपूर्ण को पूर्ण करनेवाला नाता। मैं का विस्तार संबंध में होता है। अतः वह संकुचित नहीं हो सकता। उलटे सभी संकीर्णता को जो समाप्त करता है वह संबंध होता है। परिवार ऐसे ही सहज निःस्वार्थ संबंधों का संयोग होता है। रक्त संबंधों से बने परिवार में भी जब तक कुल परंपरा और स्वाभिमान से उत्पन्न समाज में योगदान करने का उदात्त ध्येय नहीं होता तब तक ऐसा संकुचित परिवार भी जुड़ा नहीं रह सकता। स्वार्थ रक्त और वंश से बंधे संबंधों को भी तोड़ देता है। जबकि संगठन का संबंध एक विराट परिवार का सृजन कर देता है। सामान्यतः विवाह से परिवार जुड़ते हैं और कुटुम्ब का विस्तार होता है। इसीलिए भारत में विवाह संस्कार का बड़ा समारोह होता है जिसमें वृहत् परिवार साक्षी और सहभागी होता है। संगठन को समर्पित परिवारों के विवाह समारोह भी संगठन के किसी आयोजन के समान ही होते हैं। वहाँ विराट ध्येय परिवार के दर्शन होते हैं।

संगठन में संबंधों का निर्वाह ही कार्यकर्ता निर्माण का सबसे संवेदनशील सोपान है। अतः इसका निर्माण भले ही सुनियोजित पूर्व योजना से ना होता हो, निर्वहन पूर्ण सजगता से करना होता है। संबंध तो होते ही हैं। तभी सैंकड़ों में से कुछ संगठन से जुड़ते हैं। संपर्क, संवाद, सूचना के सोपान पार कर जब संबंधों का साक्षात्कार दोनों ओर अर्थात् जोड़नेवाले ज्येष्ठ कार्यकर्ता और जुड़नेवाले नूतन कार्यकर्ता को होता है तब कार्यकर्ता का जन्म होता है। हर नवजात संबंधों के अखंडमंडल को अनंत की ओर विस्तारित करता है। इसीलिए परिवार में नवजात शिशु का स्वागत बड़े धूमधाम से किया जाता है। यह उत्सव घर में नित्य हो जाता है और कुछ माह तक शिशु ही पूरे घर परिवार का केंद्र उत्सवमूर्ति होता है। उसे एक क्षण के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा जाता। संगठन में भी नूतन कार्यकर्ता को इसी उत्साह, स्नेह और आत्मीयता से संभालना सबका सामूहिक दायित्व होता है।
स्नेहमय वातावरण से आपसी मतभेद कम होते हैं और होने पर भी मनभेद में रूपांतरित नहीं होते। स्नेह शब्द का अर्थ ही है तैलीय अथवा स्निग्ध (चिकनाई)। जैसे किसी यंत्र में घर्षण को कम करने के लिए तेल के द्वारा यंत्र की सतह को स्निग्ध किया जाता है वैसे ही स्नेह संबंधों के निर्वहन में निर्माण होनेवाले अनिवार्य घर्षण को कम करने का कार्य करता है। अंग्रेज़ी में यंत्र के घर्षण को कम करने की क्रिया को lubrication कहते हैं। इसका संस्कृतनिष्ठ हिंदी में अनुवाद होगा स्नेहन। संगठन में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं पर यह स्नेहन का दायित्व होता है। उन्हें स्वयं को भूलकर इस कठिन कार्य को करना होता है। इससे संबंध व्यक्तिगत ना होकर सामूहिक होते हैं और चमू (Team) का निर्माण होता है। नेतृत्व का दायित्व जिन पर है उन्हें यह समन्वय का असिधारा व्रत करना होता है। भेदभाव रहित मुक्त आचरण से ऐसा वातावरण बनता है जिसमें हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता को अपना महत्व अनुभव होता है। समन्वय की भूमिका निर्वाह करनेवाले दायित्ववान कार्यकर्ता/अधिकारी को किसी भी विवाद में पक्ष लेने अथवा बनने से बचना होता है। तभी स्नेहमय वातावरण की निर्मिति संभव है।
प्रेम तो प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव है और सबसे अनिवार्य आवश्यकता भी। हमारा सत्य स्वरूप अनंत होने के कारण उसके प्रति अनायास आकर्षण स्वाभाविक ही है। शरीर, मन, बुद्धि के सीमित आवरण में बद्ध अहं को मुक्ति का मार्ग संबंधों में मिलता है। मित्र, परिवार, प्रेमी में व्यक्ति स्वयं को ही खोज/देख रहा होता है। इस आत्मवत् अनुभूति का आत्मीयता में रूपांतरण ही प्रेम है। शरीर और भाव के स्तर पर यह व्यक्तिगत होने के कारण एकांत और निकटता की अपेक्षा करने लगता है और निम्न वासनाओं के वशीभूत होने की संभावना ही अधिक होती है। मनोरंजन के नाम पर शृंगार साहित्य, चलचित्र, नाटकों के माध्यम से इसी व्यक्तिगत आत्मीयता का ‘प्रेम’ के नाम से महिमामंडन होता है। इस कारण कवि को संगठन में अपेक्षित प्रेम का वर्णन करते समय शुद्ध और सात्विक इन दो विशेषणों का प्रयोग करना पड़ा। संगठन में विविध आयु के भाई-बहन कार्य करते ही हैं। अतः व्यक्तिगत आत्मीयता से बचते हुए सामूहिक, उदात्त, ध्येय केंद्रित संबंध प्रोत्साहित करने होते हैं। अतः मन, भाव के साथ ही शारीरिक स्तर पर उचित सावधानियाँ शुद्धता को सुनिश्चित करती हैं। आपसी संबोधन भी महत्वपूर्ण है। हमारे प्रेम का लक्ष्य और आदर्श बंधुत्व होने के कारण भाई, भैया, दीदी, ताई जैसे संबोधन वातावरण की शुचिता को बनाये रखते हैं। इस कारण राष्ट्रीय विचारों से प्रेरित संगठनों में अधिकतर ऐसे ही संबोधनों का प्रयोग होता है। बड़ी आयु के अधिकारी भी अपने से छोटी बहनों को दीदी कहते हैं। यही आदर्श सभी को शुद्ध प्रेम के लिए प्रेरित करता है। शुद्ध प्रेम आध्यात्मिक उन्नति का सहज साधन है।

सात्विकता का अर्थ मात्रा और सघनता में संतुलन से है। भावों में सघनता अथवा संवाद साहचर्य में आधिक्य राजसिकता की श्रेणी में आएगा। इसमें आवेग अधिक होने से कई बार शीघ्र और तीव्र प्रभाव प्राप्त होते हैं। किंतु उतने ही अविलंब मतभेद और विवाद भी निर्माण होता है। ऊष्णगतिमानता (Thermodynamics) का नियम ही है कि शीघ्र उष्ण होनेवाली वस्तु उतनी ही गति से ऊर्जा खोती है और अविलंब शीत हो जाती है। उसी प्रकार स्वार्थ और उच-नीच का भाव तामसिकता की श्रेणी में आ जाएगा। ऐसे में प्रेम केवल दिखावा रह जाएगा और संबंध शोषण का माध्यम। अतः सात्विक प्रेम सबके प्रति समान, बराबरी के भाव के साथ संतुलित आवेग तथा संवाद एवं साहचर्य में संयमित होता है।

शुद्ध, सात्विक प्रेम से ही संगठनात्मक संबंधों में सुदृढ़ता आती है। यही हमारा वास्तविक कार्य है। ममता जनित गुटबाज़ी, व्यक्तिगत राग-द्वेष, व्यवहार में भेदभाव और अनुचित निकटता संगठन को तोड़ने का ही कार्य करती है। संगठन का ध्येय महान और दूरदुर्लभ हो सकता है। कभी कभी परिस्थितिवश असम्भव भी प्रतीत होता है। ऐसे में मार्ग पर चलते रहने का उत्साह और प्रेरणा सहयात्रियों के शुद्ध सात्विक संबंधों से ही प्राप्त होता है। ध्येय के अनुरूप कार्यप्रणाली और कार्यपद्धति का विकास योजनापूर्वक करने के बाद पूर्ण विश्वास के साथ उसपर लगे रहना ही एकमात्र मार्ग है। इस सतत ध्येय गमन के लिए सतत प्रेरणा और साथ अपेक्षित होता है क्योंकि यह व्यक्तिगत के साथ ही संगठनात्मक ध्येय पथ है। इसलिए परिवार से भी अधिक आत्मीय चमू ही यह कार्य संपूर्ण कर सकती है। चमू का निर्माण और सतत स्नेहन संबंधों के निर्वहन से ही संभव है। यही हम सब का मुख्य कार्य है और इसका आधार है शुद्ध, सात्विक प्रेम।

उपरोक्त लेख के सूत्र संगठन के प्राण स्वरूप हैं
कार्यकर्ता के लिये धारण करने योग्य हैं
नये विकासमान कार्यकर्ताओं में इस विषय का प्राणसंचार आवश्यक प्रतीत होता है