संवाद से संगठन विस्तार

Mukul Kanitkar 7 मिनट का पठन

संपर्क के माध्यम से हमारा प्रयत्न संवाद साधने का होता है। कुछ व्यक्तियों के साथ ऐसा अनुभव होता है कि वे हमारी प्रतीक्षा ही कर रहे थे और संवाद स्वतः स्थापित होता है। अधिकतर समय प्रयत्नपूर्वक संवाद साधना होता है। इसमें हम क्या कहते हैं उससे अधिक परिणामकारी कितना अधिक और कितने ध्यानपूर्वक सुनते हैं यह होता है। संवाद में श्रवण प्रमुख होना चाहिए। जो कार्यकर्ता सामनेवाले को स्वयं के बारे में खुलकर बोलने के लिए सहज प्रेरित करते हैं वे अच्छा संवाद स्थापित करते हैं। पूर्ण सतर्क एकाग्रता से सुनना अधिक बोलने के लिए प्रेरित करता है। समुचित प्रतिक्रिया भी प्रेरक होती है। अति प्रतिक्रिया अथवा बीच बीच में बोलना कृत्रिम और नाटकीय होता है और मित्रवत संवाद के स्थान पर औपचारिक वार्तालाप रह जाता है।

सुनते समय अपने संगठन के विषय की ओर सहजता से मोड़ना सर्वोत्तम होता है। संपर्क में आए व्यक्ति की अभिरुचि, ज्ञान और अनुभव के क्षेत्र पर चर्चा करते करते संगठन के विषय जैसे शिक्षा पर लाना अधिक परिणामकारी होता है। संवाद स्थापित करते समय प्रारंभ से ही वादविवाद में नहीं उलझना चाहिए। जहां तक सम्भव हो तर्क (Argument) में नहीं पड़ना चाहिए। इसका अर्थ यह भी नहीं की उनकी हर बात से सहमत ही हुआ जाए। अपने विषय से संबद्ध किसी बात पर असहमति हो तब दुर्लक्षित कर सकते हैं। हर बात को प्रथम संवाद में ही स्पष्ट करना आवश्यक नहीं होता। अपने संगठन के विषय में कोई एकदम विपरीत बात की जा रही हो तब विनम्रता से मतभिन्नता का संकेत कर सकते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि आगे किसी दिन अधिक समय हो तब इस विषय पर प्रदीर्घ चर्चा कर सकते हैं। अपने मन में एक बात स्पष्ट हो कि तर्क में जीतने के स्थान पर व्यक्ति को आत्मीयता से अपनाना (जीतना) अधिक उपयोगी है। इसलिए एक कुशल संगठक का संवाद मंत्र होता है कि – असहमति के लिए पूर्ण सहमति है – We agree to disagree. इससे संवाद बना रहता है। आगे शनैः शनैः अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के और अवसर भी प्राप्त होते हैं।

संवाद दोनों ओर से होता है। अतः सभी को विचार रखने का स्वातंत्र्य और अवसर देना चाहिए। किसी प्रसंग में स्वयं को कम अवसर मिले तो भी वह आगामी संवाद की नीव डलती है। सैंकड़ों संपर्कित व्यक्तियों में से कुछ ही संवाद में जुड़ते हैं। संवाद का सातत्य भी आवश्यक है। अतः केवल एक बार संवाद से अपना कर्तव्य पूरा नहीं होता। प्रथम संवाद में ही आगे की योजना करना उपयुक्त होता है। अतः अनुभवी कार्यकर्ता संवाद का अंत आगामी भेट अथवा संवाद के समय निर्धारण से करता है। संवाद से ही मित्रता होती है। संपर्कित व्यक्ति को सक्रिय बनाने का साधन संवाद है।

संगठन के कार्य में संवाद केवल नये लोगों से ही नहीं पुराने साथियों से भी रखना होता है। संवाद भी कार्यकर्ता के नित्य अभ्यास का अंग होता है। जैसे नूतन संपर्क प्रतिदिन करना है वैसे ही संवाद भी प्रतिदिन करना है। वर्तमान युग में संवाद के साधन बढ़ गये हैं। केवल सजगता से उनका प्रयोग संवाद में करना आवश्यक है। व्यक्तिगत संदेश के साथ समूह (ग्रुप), प्रसार (Broadcast) आदि की व्यवस्था भी हमारे संवाद यंत्रों में उपलब्ध है। सही प्रयोग से कार्यकर्ता इनको अपना संगठनात्मक साधन बना सकता है। समय व्यर्थ गंवाने का भय यथार्थ है। अतः इन साधनों के प्रयोग में सावधानी और सतर्कता आवश्यक है। हावभाव तथा चेहरे की प्रतिक्रियाओं का भी अंतर्भाव होने के कारण सीधे बात करना सदैव सर्वोत्तम होता है। दृक् अथवा ध्वनि दूरभाष का प्रयोग भी नित्य और अधिक बार संवाद में कर सकते हैं। दूरी अथवा व्यस्तता के कारण बार बार प्रत्यक्ष मिलना संभव ना भी हो तब भी इन साधनों के समुचित उपयोग से हम सतत संवाद बनाए रख सकते हैं।

संगठन किसी सीढ़ी में समान होता है। प्रत्येक कार्यकर्ता इस श्रेणी में किसी एक सोपान पर होता है। प्रतिदिन संवाद का अभ्यास बनाते समय यह ध्यान रखे कि तीनों स्तरों पर संवाद आवश्यक होता है। एक तो ऊपरी सोपान अर्थात् हमारे अधिकारियों से नियमित संवाद की योजना करनी चाहिए। प्रतिदिन एक ही अधिकारी से बात करना अपेक्षित नहीं है किंतु उचित अंतराल पर एक एक कर सभी के साथ संवाद बनाना संगठन के स्वास्थ्य हेतु उपकारक होता है। प्रत्येक कार्यकर्ता का एक सीधा अधिकारी (Reporting Authority) होता है। उसे तो नियमित कार्यवृत्त देना ही होता है। कुछ आशंका अथवा भ्रम होने पर स्पष्टता भी उन्हीं से लेनी है। अन्य अधिकारियों से सामान्य संवाद ही अपेक्षित है। निर्णयात्मक चर्चा में अपने वृत्ताधिकारी को टाल कर ऊपर के अधिकारी से चर्चा करना संगठन के लिए हानिकारक होता है। उच्चाधिकारी के बारे में अपने मन में कुछ आपत्ति या मतभिन्नता हो तब उनके ऊपर के अधिकारी तक बात पहुँचाना उचित ही है। किंतु उसके बाद उनके विवेक पर विश्वास करना चाहिए और बात को इधर उधर नहीं प्रसारित करना चाहिए।

संवाद का दूसरा स्तर अपने समान सोपान के कार्यकर्ताओं से संवाद। संगठन के कार्य हेतु आपसी समझ के लिए नित्य संवाद अनिवार्य है। उसके साथ ही मित्रवत् संवाद भी संगठन की चमू (Team) को सुदृढ़ करता है। यह व्यक्तिगत एक एक के साथ और सामूहिक भी हो सकता है। मतभेद मनभेद ना बनें इस हेतु यह नियमित संवाद संगठन और कार्यकर्ता दोनों की कार्यशैली का अंग बनाना अपेक्षित है। दो सावधानियाँ आवश्यक हैं। समान सोपान के कार्यकर्ताओं में मित्रता के कारण गुट बनने की संभावना होती है। अपने संवाद से ऐसी संभावना को कम करना उचित है। प्रयत्नपूर्वक सभी से संवाद साधने से ऐसा होता है। दूसरी सावधानी नकारात्मक बातों के प्रसारण के बारे में है। समान स्तर पर नकारात्मक बातों का क्षितिजगामी (Horizontal) फैलना संगठन को अंदर से खोखला कर देता है। गीता के 16 वे अध्याय में इसे आसुरी गुण पैशुन कहा है। चुग़ली करना निर्बल मनोभाव का लक्षण है। अतः कार्यकर्ता को इससे स्वयं को बचाना चाहिए। जिसके प्रति मन में अपवाद हो उससे सीधा संवाद मन को निर्मल और सबल बना सकता है। हमे सामूहिक संवाद की परंपरा द्वारा ऐसा खुला एवं मुक्त वातावरण बनाना चाहिए जिससे परस्पर प्रतिभाव (Feedback) देना और खुले मन से उसे ग्रहण करना सहज प्रक्रिया हो जाए। यह नियमित संवाद से ही संभव है।

कार्यकर्ता संवाद का तीसरा स्तर है हमारे नीचे के सोपान पर स्थित साथी कार्यकर्ता जो हमारे अभिभावकत्व में हैं। यह पालकत्व कोई भारी दायित्व नहीं मित्रवत् सहयोग ही है। हमे बड़े भाई या अधिकारी के रूप में संवाद नहीं साधना है अपितु अनुभवी मित्र के समान अपनी उपलब्धता अनुभव करता संवाद साधना है। इसमें हमे ही पहल करनी होती है। अपनी ओर से सुनने के लिए संवाद करना होता है। इसकी भी नियमितता बना सकें तो प्रभाव अधिक होता है। कुछ सावधानी इस स्तर के संवाद में भी रखनी होती है। एक तो हमारा संवाद उपदेशात्मक अथवा सदा त्रुटि शोधक ना बन जाए। सुनना अधिक आवश्यक है। किंतु उचित प्रतिभाव की आवश्यकता पड़ने पर उसे प्रदान करने की स्पष्टता और स्वीकार दोनों ही नियमित संवाद से संभव होता है।

जैसे प्रतिदिन संकल्प के साथ नूतन संपर्क करना है वैसे ही तीनों सोपानों का संवाद भी नित्य करना है। यही हमारी संगठन साधना है। जैसे साधक प्रतिदिन जप, अनुष्ठान, ध्यान आदि साधन करता है वैसे ही कार्यकर्ता नित्य संपर्क और संवाद करता है। इसी से संगठन का विस्तार होता है।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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One comment

  1. यह आलेख संगठन के दृष्टिकोण से पाथेय है।

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