तैत्तिरीय उपनिषद का एक प्रकार से प्रथम अध्याय शीक्षावल्ली है। इसमें आगे कि ब्रह्मसाधना के लिए पूर्व तैयारी के रूप में उच्चारण का शास्त्र बताया है। वाणी ज्ञान की वाहक है। ज्ञान का प्रवहण वाणी के माध्यम से ही होता है। अतः भारतीय शिक्षा पद्धति में वाणी की शुद्धि को भी अन्य पंचशुद्धियों के समान ही महत्व दिया गया है। शीक्षावल्ली में क्रमशः वाचाशुद्धि के भिन्न भिन्न मार्ग बताए गए हैं। उच्चारण का महत्व इतना अधिक है कि पूर्ण अस्तित्व के संयोग का शास्त्र भी इसके शुद्धीकरण का भाग बना है। पंच अधिकरणों से बात का प्रारंभ होता है। पाँच स्तरों पर संहिता अर्थात् एकत्रीकरण के सूत्र शीक्षावल्ली में बताए है। चेतना के सर्वोच्च अर्थात् सूक्ष्मतम स्तर है लोक अतः अधिलोक में निम्न से उच्च लोकों की महासंहिता कही गई है।
अथा॑धिलो॒कम्। पृथिवी पू᳚र्वरू॒पम्। द्यौरुत्त॑ररू॒पम्। आका॑शस्स॒न्धिः। वायु॑स्सन्धा॒नम् । इत्य॑धिलो॒कम् ।
इसके अगले स्तर पर अधिज्योतिष है। जिसका संधान विद्युत में होता है। उसके बाद अधिविद्य स्तर में गुरुशिष्य सम्बंध का अद्भुत वर्णन है।
अथा॑धिवि॒द्यम्। आचार्यः पू᳚र्वरू॒पम् ॥ 2 ॥
अन्तेवास्युत्त॑ररू॒पम्। वि॑द्या स॒न्धिः। प्रवचनग्ं॑ सन्धा॒नम्। इत्य॑धिवि॒द्यम्।
आचार्य के अनुच्चार में अंतेवासी अर्थात् शिष्य सम्यक् उच्चारण सीखता है। इसका संधान प्र-वचन है। प्रकृष्ट वचन अर्थात् जो उच्चारित हो उसका प्राणस्तर पर श्रोता के भीतर संस्कार हो यही विद्या है। इस संधि के लिए भी वाणी का शुद्ध होना अपेक्षित है।
अधिप्रज में विकसित संतति की संहिता का वर्णन करने के बाद व्यक्तिगत स्तर के करण के रूप में अध्यात्म संहिता का वर्णन हुआ है। यह शरीर के कर्मेंद्रिय वाक् को संधि के रूप में स्थापित करता हैं।
अथाध्या॒त्मम् । अधरा हनुः पू᳚र्वरू॒पम् । उत्तरा हनुरुत्त॑ररू॒पम् । वाक्स॒न्धिः । जिह्वा॑ सन्धा॒नम् । इत्यध्या॒त्मम् ।
इन सब को महासंहिता कहा गया है। इनका साधन कर संधि को सिद्ध करने पर साधक जो चाहे वो पा सकता है।
सन्धीयते प्रज॑या प॒शुभिः।ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्ग्येण॑ लोके॒न॥ 4॥
पद, पैसा, प्रतिष्ठा जैसे लौकिक उपलब्धियों के साथ ही ब्रह्मवर्चस जैसी आध्यात्मिक आकांक्षायें भी वाणी की साधना से परिपूर्ण होती है। क्रम में आगे व्याहृतियों की भी चर्चा की गई है। भारत में ऋषियों ने वाचा की शुद्धि पर सर्वाधिक ध्यान दिया है। संस्कृत शब्द का अर्थ ही संस्कारित होता है। स्वरयंत्र से सहज निकलने वाली प्राकृत वाणी का संस्कार होने से वह संस्कृत हो जाती है। संस्कृत भाषा नहीं वाणी की साधना है। अतः शिक्षा व्यवस्था में प्रारम्भ से ही संस्कृत का प्रयोग शिक्षण सहायक (pedagogical tool) के रूप में किया जाना चाहिए। संस्कृत से सभी सिद्धियाँ सम्भव है।

नवमी की देवता सिद्धिदात्री है। उन्हीकी कृपा से भगवान शिव को भी सिद्धियाँ प्राप्त हुई थी। अर्द्धनारीश्वर का रूप भी शिवजी को माता सिद्धिदात्री की कृपा से ही प्राप्त हुआ था। इनकी भक्ति से सभी लौकिक और पारलौकिक कामनाओं की पूर्ति होती है। वाणी की लोक से लेकर वाक् तक की शुद्धि भी ऐसे ही सब सिद्धियों का मार्ग खोल सकती है। अणिमा, महिमा केवल आकार के छोटा-बड़ा करने की सिद्धि नहीं है ये मन का संस्कार है कि कार्य की आवश्यकता के अनुसार कहाँ छोटा बनकर बड़ों से मार्गदर्शन लेना है और कहाँ बड़े बनकर सहयोग करना है। मन, वाणी और बुद्धि की शुद्धि से ये क्षमता आती है। वैसे ही मानसिक रूप से ही गरिमा और लघिमा को भी समझा जा सकता है। वाणी की साधना से ही यह बड़प्पन अथवा विनय संभव है। इशित्व में औरों के हृदय में स्थान बनाकर सर्वसमावेशक बनना और वशित्वं में औरों को अपने वश में करना दोनों ही संवाद कौशल से ही संभव है जो फिर वाणी की साधना से ही होगा। आठों सिद्धियाँ वाणी की साधना से मिलती हैं।
माता सिद्धिदात्री की कृपा से वाचा शुद्धि के लिए संस्कृत का समावेश शिक्षा व्यवस्था में सभी स्तरों पर हो यही प्रार्थना।

ज्ञानवर्धक युगानुरूप 🙏🙏🙏