हुतात्माओं का स्वप्न

Mukul Kanitkar 3 मिनट का पठन

स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां सब ओर चल रही है| एक सप्ताह ही तो बचा है| शिक्षक लगे होंगे, छात्र भी उत्साह से गीत, नाटक तैयार कर रहे होंगे| पर संवेदनशील देशभक्त सोच रहा है क्या ६४ वर्षों बाद भी हम हुतात्माओं के स्वप्नों को पूरा कर पाए है? हंसते हंसते जिन्होंने अपना यौवन मातृभूमि पर अर्पण कर दिया| क्या सोचा होगा फांसी के तख़्त पर खड़े होकर वन्दे मातरम का जयघोष करते हुए? मेरी मातृभूमि जब स्वतंत्र होगी तब ना केवल अपने प्रत्येक सपूत के जीवन को सुखमय और धन्य कर देगी अपितु पुरे विश्व को ही जीने की राह दिखाएगी| अरे यही तो है ना इस राष्ट्र का जीवन -ध्येय ?

क्षमा करें उत्सव के समय ऐसी बातें करने के लिए| ७ दिन पहले लिखा है ताकि सोचकर संकल्प ले उत्सव के दिन…

बड़ा पुराना गीत है ५० के दशक का है| आज फिर facebook पर दिख गया तो सोचा सबके साथ बांटा जाये| बड़े मार्मिक प्रश्न उठायें है कवी ने…

उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का ये
उजाला करोड़ों घरों में न पहुँचा।
खुला पिंजरा है मगर रक्त अब भी
थके पंछियों के परों में न पहुँचा॥

न संयम-व्यवस्था न एकात्मता है
भरी है मनों में अभी तक गुलामी
वही राग अंग्रेजियत का अभी तक
सुनाते बड़े लोग नामी -गिरामी
लुढ़कती मदिर जिन्दगी की लयों में
अभी मुक्ति-गायन स्वरों में न पहुँचा॥ खुला ॥

मिले जा रहे धूल में रत्न अनगिन
कदरदान अपनी कदर कर रहे हैं
मिला बाँटने जो अमिय था सभी को
प्रजा का गला घोंट घर भर रहे हैं
प्रजातंत्र की धार उतरी गगन से
मगर नीर जन-सागरों में न पहुँचा॥ खुला॥

विंधा जा रहा कर्ज से रोम तक भी
न थकते कभी भीख लेकर जगत से
बिछाये चले जाल जाते विधर्मी
मगर स्वप्नदर्शी नयन हैं न खुलते
बचा देश का धन लिया तस्करों से
मगर मालिकों के करों में न पहुँचा
खुला पिंजरा है मगर रक्त अब भी
थके पक्षियों के परों में न पहुँचा॥खुला॥

आज तक की पीढ़ी तो टाल गयी उत्तर देना, पर अब और अवसर नहीं बचे| अभी नहीं तो कभी नहीं| आज मानवता इस कगार पर है कि यदि माँ भारती गुरुपद पर विराजित ना हो, समर्थ ना बनें तो मानव का अस्तित्व ही खतरें में है| अपने लिए ना सही विश्व के मंगल के लिए जागना ही होगा | भारती की संतति को अपना कर्तव्य निभाना ही होगा|

बोलो हो तैयार???

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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