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Mukul Kanitkar

244 लेख

सामयिक टिप्पणी

अंतरतम के प्रह्लाद की खोज का पर्व: होली

समाज हिरण्यकश्यपुओं से भर गया है। हिरण्य के दो अर्थ है – एक है स्वर्ण और दूसरा है चमकनेवाला। धन और दिखावे के प्रति…

27 March 2013 Mukul Kanitkar
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Marathi Lekh

श्रध्दा: धगधगती यज्ञशिखा

गत दोन वर्षांचा अनुभव दिसतो की भारताच्या नवशिक्षित युवकांमध्ये जागृति आली आहे. मोर्चे, आंदोलन उपोषणात तरूणांची संख्या वाढतेच आहे. दूसरीकडे कावड, पदयात्रा, किर्तन, कथा,…

8 March 2013 Mukul Kanitkar
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सामयिक टिप्पणी

सूर्यनमस्कार का विज्ञान

जो सूर्यनमस्कार का प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, उनको आयु, वीर्य, बल, प्रज्ञा तथा तेज की प्राप्ति होती है  और सामूहिक सूर्यनमस्कार के अभ्यास से…

9 February 2013 Mukul Kanitkar
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Marathi Lekh

जीवनाचे उद्दिष्ट काय?

१९८५ मध्ये भारत सरकारने विचार केला की, पूर्ण देशात एक दिवस तरूणांकरिता असावा. जसा महिला दिन, बाल दिवस तसाच युवा दिवस. शोधाशोध सुरू झाली…

31 January 2013 Mukul Kanitkar
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सामयिक टिप्पणी

राष्ट्रीय शिक्षा के प्रवर्तक विश्वात्मा विवेकानन्द

    स्वामी विवेकानन्द विश्वात्मा थे। उन्होंने सृष्टि की एकात्मता का अनुभव किया था। अमेरिका में सहस्त्रद्विपोद्यान (Thousand Island Park) में अपने अंतरंग शिष्यों कें…

12 January 2013 Mukul Kanitkar
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सामयिक टिप्पणी

कल्पतरु दिवस की शुभकामनाएं !

श्री रामकृष्ण-विवेकानन्द भावधारा में 1 जनवरी को कल्पतरु दिवस के रुप में मनाया जाता है। इसके पीछे के इतिहास को देखने से पहले हम…

1 January 2013 Mukul Kanitkar
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सामयिक टिप्पणी

अनास्था से केवल आक्रोश ! आस्था से परिवर्तन !!

स्वामी विवेकानंद के राष्ट्र चिंतन के प्रथम दिन : प्रश्न आस्था का है । मनुष्य आस्था के बल पर कुछ भी चमत्कार कर सकता…

26 December 2012 Mukul Kanitkar
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कविता

फिर फूंको पांचजन्य ! फिर सुनाओ गीता !!

आज भ्रमित अर्जुन विषादग्रस्त नहीं आक्रोशित है। तमस नहीं आज रजस का प्रकोप है। अपने में सिमटा सकुचा, परास्त नहीं आज का अर्जुन, संख्याबल…

24 December 2012 Mukul Kanitkar
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