राष्ट्रीय शिक्षा के प्रवर्तक विश्वात्मा विवेकानन्द

Mukul Kanitkar 5 मिनट का पठन

SVquote Bharat utho    स्वामी विवेकानन्द विश्वात्मा थे। उन्होंने सृष्टि की एकात्मता का अनुभव किया था। अमेरिका में सहस्त्रद्विपोद्यान (Thousand Island Park) में अपने अंतरंग शिष्यों कें प्रशिक्षण के मध्य एक दिन स्वामींजी अपने कक्ष मे एक कोने से दुसरे तक चक्कर लगा रहे थे। उनके शिष्यों ने लिखा है कि पिंजडे में बंद क्रुध्द सिंह के समान स्वामीजी की छटपटाहट थी। किसी की बीच में बोलने की हिम्मत नहीं थी। चलते चलते अचानक स्वामीजी रूके और अपने शिष्य कप्तान सेवियर के कंधे झकझोरते हुए बोले ‘‘ये विश्व समझता क्यों नहीं कि वह ईश्वर से व्याप्त है?’’ विश्व को उसके दिव्यत्व का परिचय कराना उनकी व्याकूलता का मर्म था। यही इनका जीवन ध्येय था।
भारत मे लौटने के बाद उन्होंने पूरे भारत के दिग्विजयी प्रवास में यही घोषणा की। विश्व मानवता को अपने दिव्यत्व का परिचय कराने के लिए इस राष्ट्र का तपःपूत अविष्कार हुआ है। जगत् का मार्गदर्शन ही भारत का जीवनोद्देश्य है। यही स्वामी विवेकानन्द की विश्वविजय की संकल्पना थी। उन्होंने कहा था, ‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से विश्व पर विजय प्राप्त करो।’ भारत विश्व को राजनैतिक अथवा सामरिक दासता से जीतना नहीं चाहता। हमें विश्व का राज्य नही चाहिए। ना ही हम व्यापार से विश्व बाजार पर कब्जा करना चाहते है। भारत की आंतरिक अभिलाषा है जगद्गुरू बनना। यही हमारी राष्ट्रीय नियति है। स्वामीजी की भारतभक्ति मानवकल्याण का ही मार्ग थी।
इस राष्ट्रीय उद्देश्य के अनुरूप ही राष्ट्रीय शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने ऐसे समर्थ, समृध्द व समरस भारत के निर्माण हेतु आवश्यक शिक्षा पध्दतिtatasv का प्रतिपादन किया। विज्ञान की शिक्षा को उन्होंने अत्यंत आवश्यक माना। शिकागो जाते समय मुम्बई से जापान तक जमशेदजी टाटा स्वामीजी के साथ थे। स्वामीजी ने टाटा को दो ऐतिहासिक प्रेरणायें दी। एक तो भारत में फौलाद उद्योग को पुनर्जीवित करना। 18 वी शताब्दी तक भारत की लौह भट्टियाँ विश्व का सर्वोत्तम फौलाद निर्माण करती थी। स्वामीजी ने स्वप्न देखा कि भारत पुनः लौह उद्योग का अग्रणी बन जाए। जमशेदजी टाटा को दूसरी प्रेरणा दी विज्ञान में अनुसंधान की। ‘टाटा भौतिक अनुसंधान संस्थान’ बंगलुरू की स्थापना के बाद टाटा ने स्वामीजी को पत्र लिखा जिसमें इस चर्चा का उल्लेख है। टाटा की इच्छा थी कि स्वामीजी इस संस्थान के निदेशक बने। आज भी संस्थान के स्वागत कक्ष में यह पत्र बडे अक्षरों में अंकित है।
बाद में रामकृष्ण मठ व मिशन की स्थापना के समय स्वामीजी ने सन्यासियो से कहा, ‘जाओं! गांवो को शिक्षित करों! इन्हें सच्चे धर्म की शिक्षा दो। पाखंड़ और आडम्बर से मुक्त करों। एक हाथ में पृथ्वी का गोल व दूसरे में टार्च लेकर इन्हें शिक्षा दो कि ग्रहण कैसे होता है।’
स्वामीजी चरित्र-निर्माण करनेवाली सर्वांगीण शिक्षा की बात करते थे। उनकी शिक्षा की परिभाषा थी, ‘मानव के अन्तर्निहित पूर्णत्व की अभिव्यक्ति’। बाहरी सूचनाओं को मस्तिष्क में ठूसने को वे शिक्षा नहीं मानते थे। अन्दर के ज्ञान को प्रस्फुटित करनेवाली अनुभूति मूलक प्रायोगिक शिक्षण पध्दति का उन्होंने प्रतिपादन किया। आज अनेक शैक्षिक प्रयोग इस विधि को आधुनिकतम मानकर अपना रहे है ।
स्वामीजीने शिक्षा के लोकव्यापीकरण की कल्पना की भी। उन्होंने भारत निर्माण के लिए जनसामान्य को शिक्षित करने पर बल दिया। सामान्य व्यक्ति की आर्थिक वास्तविकताओ का भान इस सन्यासी को था। दो समय की रोटी की चिंता करनेवाले श्रमिक, किसान के लिए विद्यालय तो अकल्पनीय अपव्यय था। इस बात को समझकर स्वामीजी ने कहा, ‘प्यासा कुए के पास न आ सके तो कुए को प्यासे के पास ले जाओ। शिक्षा को श्रमिक के कार्यस्थल किसान के खेत में ही उपलब्ध करा दो। गाँव की चैपाल को विद्यादान का केन्द्र बना दो।’
नारी शिक्षा की अनिवार्यता को स्वामीजी ने भलीभाँति जाना था। माँ के शिक्षित होने का अर्थ है परिवार का सुशिक्षित होना। मार्गारेट नोबल को उन्होंने भारत में स्त्रीशिक्षा की नीव रखने के लिए प्रेरित किया। पूर्ण प्रशिक्षण के बाद समर्पित शिष्या को नाम दिया भगिनी निवेदिता। भगिनी निवेदिता ने सारदा बालिका विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा के आंदोलन का सूत्रपात किया। आगे चलकर महर्षि अरविन्द, टिळक, आगरकर व महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा को स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनाया।
स्वतंत्रता के बाद हमने शिक्षा के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया। कुछ जनजातीय क्षेत्रों को छोड दिया जाए तो आज देश के कोने कोने में शिक्षा की व्यवस्था उपलब्ध है। पूर्ण सफलता में निश्चित ही अभी और परिश्रम आवश्यक है, किन्तु इससे अधिक अनविार्य है शिक्षा में भारतीयता की। भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप भारतहित की देशज शिक्षा पध्दति के निर्माण का चिंतन, प्रयोग व प्रसार करना स्वामी विवेकानन्द की 150 वी जयंतिपर उन्हें समुचित श्रध्दांजली होगी।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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