महागौरी उपासना : प्रबुद्ध वर्ग की वैचारिक क्रांति

Mukul Kanitkar 3 मिनट का पठन

वैचारिक आंदोलनः

हमने मधु-कैटभ को आधुनिक मिड़िया के साथ जोड़कर देखा था। उसी तारतम्य में शुम्भ-निशुम्भ को भी समझना होगा। शुम्भ का अर्थ होता है प्रकाशित या चमकदार और निशुम्भ का मतलब है मारक, प्राण हरनेवाला। जब दोनों को साथ में देखते हैं तो इस दानव जोड़ी का अर्थ होता है – विघातक लोग जो प्रसिद्धि पा गये हैं। वर्तमान समय में एक पद चल पड़ा है – आयकॉन। इसका अनुवाद तो कठिन है पर निकटतम् पर्याय होगा प्रतीक। हमारे माध्यम समाज में प्रतीकों को स्थापित करते हैं और फिर उनके माध्यम से विचारों को प्रसारित करते हैं। यह आवश्यक नहीं कि जिस बात के लिये ख्याति हो उसका प्रसार के विषय से कोई संबंध हो। जैसे सचिन तेण्डुलकर भले ही खिलाड़ी हो पर पेप्सी से सिमेण्ट तक सब बेचता है। वस्तु बेचने से अधिक खतरनाक है विचार बेचना, वह भी केवल पैसे के लिये। अरूंधति रॉय, विनायक सेन, तीस्ता सेतलवाड़, प्रशांत भूषण जैसे देशद्रोहियों के स्वयंभु प्रवक्ता शुम्भ-निशुम्भ की सेना ही है।
असुर सेना के नामों में भी संकेत हैं। धुम्रलोचन – आँखों में धुआं झोंकनेवाला; चण्ड – पाशविक बल ही है दिमाग नहीं, हिंसा का प्रवक्ता; मुण्ड – धड़ नहीं है केवल मुख, बिना आधार के बातें करनेवाला – दिग्विजय सिंह जैसा। रक्तबीज का तो नाम ही बताता है – इनका उत्पादन करने वाली संस्थाएँ। हमारे अनेक विश्वविद्यालय देश का पैसा काम में लेकर उसी के विरोध में अनुसंधान किये जा रहे हैं। गत दिनों दिल्ली में एक शोधार्थी के आवेदन में उसके अनुसंधान का विषय लिखा था – ‘‘बड़े पड़ोसी देश से छोटे देश को खतरे और उनके द्विपक्षीय संबंध – विशेष संदर्भ भारत-बांग्लादेश संबंध’’। अब आप बताएँ इस अध्ययन की भारत में क्या प्रासंगिकता है? ढ़ाका विश्वविद्यालय में इस बात पर शोध हो तो ठीक है पर दिल्ली के प्रतिष्ठित जे.एन.यु. में ऐसा होता है तो उस मार्गदर्शक और शोधार्थी दोनों को रक्तबीज की संतान ही कहना होगा। ये संस्थान ऐसा कार्य कई वर्षों से कर रहे हैं। राष्ट्रहित में कार्य करनेवाले वैचारिक संगठनों को इसका उत्तर देना होगा।
महाअष्टमी को महागौरी की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप भी बड़ा प्रतीकात्मक है। गौरी जब तप और श्रम से धूलधुसरित हो जाती है तो स्वयं शिवजी उनको गंगा जल से नहलाते हैं। जब स्वयं भगवान ही शुद्धि करें तो क्या कहना? भगवती गौरी का स्वरूप चमकने लगता है और वे महागौरी बन जाती हैं। उनके वस्त्र भी शुभ्र हैं और सारे आभूषण भी चांदी के। पूरा स्वरूप ही शुचिता की प्रतिमूर्ति है। वाहन है सफेद बैल, शुद्धि के साथ श्रम व शक्ति का प्रतीक।
संगठन को भी महागौरी का ही पूजन करना है। प्रबुद्ध वर्ग के बुद्धि की शुद्धि करनी है। पर यह लगातार श्रम का काम है। श्रम व शक्ति के द्वारा वैचारिक परिवर्तन करना है। आज की महाअष्टमी की पूजा से वैचारिक क्रांति का सूत्रपात करना होगा। वर्तमान युग ज्ञानयुग है। ज्ञान की उपासना से ही धर्म की आदर्श व्यवस्था की स्थापना हो सकती है। अतः प्रबुद्ध वर्ग की वैचारिक क्रांति ही महागौरी की सच्ची उपासना है।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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2 Comments

  1. आज भी शुम्भ, निशुम्भ, चंद, मुंड, धूम्रलोचन आदि असुर है हमारे आस पास ही है उन्हें पहचानें ओर साथ ही प्रबुद्ध जनो को भी पहचाने ओर उन सभी से यथोचित व्यवहार करें। यही समझा मैं ।
    प्रणाम

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