कार्यकर्ता : कृपा कात्यायनी की . . .

Mukul Kanitkar 4 मिनट का पठन

कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ोसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते हैं पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य संपन्न होते हैं। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। केवल अपना देखो, दूसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता हुआ दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी माताएँ कहाँ चली गयीं?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया इसी से नाम पड़ा कात्यायनी।

संगठन में दिव्यता को अपने में जन्म देने की तैयारी वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। वास्तव में ऐसे समर्पित कार्यकर्ता ही संगठन बनाते हैं। वे ही संगठन का आधार होते हैं। जितनी अधिक मात्रा में ऐसे कार्यकर्ता संगठन के पास होंगे उतना ही संगठन का विस्तार होगा। कुछ संगठनों में अपना पूर्ण जीवन संगठन को अर्पित करनेवाले पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की व्यवस्था होती है। उन संगठनों में ये पूर्ण समर्पित कार्यकर्ता संगठन की रीढ़ बनते हैं। फिर अगले चक्र में ऐसे कार्यकर्ता होते हैं जो पूरा समय तो नहीं दे पाते किन्तु समर्पण पूर्ण होता है। अपने व्यवसाय व परिवार के साथ बराबर की वरीयता व महत्व ये कार्यकर्ता संगठन को देते हैं। संगठन के कार्य के लिये समय भी नियमित रूप से निकालते हैं। संसाधनों को एकत्रित करने में भी ऐसे कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान होता है। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की संख्या कितनी भी अधिक हो जाएँ वह सीमित ही होगी। अतः दूसरे चक्र के कार्यकर्ता कार्य को स्थायित्व प्रदान करते हैं। संगठन की समाज में प्रतिष्ठा भी ऐसे कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर होती है। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि किसी संगठन के साथ जुड़ जाते हैं तो अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संगठन की साख में वृद्धि करते हैं।

तीसरी श्रेणी में ऐसे कार्यकर्ता आते हैं जो नियमित समयदान अथवा वैचारिक योगदान भी नहीं करते किन्तु पूरी श्रद्धा से मुख्य कार्यकर्ताओं का नैतिक समर्थन करते हैं और समय पड़ने पर आवश्यकता के अनुसार समय, श्रम और अन्य संसाधनों का योगदान भी करते हैं। एक चौथी परत भी होती है संगठन से जुड़ने वालों की। इन्हें कार्यकर्ता तो नहीं कहा जा सकता किन्तु होते ये भी महत्वपूर्ण हैं। इन्हें आप संगठन के शुभचिंतक कह सकते हैं। ये संगठन के विचार, लक्ष्य व कार्य को समझते हैं और इससे सहमत भी होते हैं। किन्तु भिन्न वरीयताओं के कारण प्रत्यक्ष योगदान नहीं देते। समाज में संगठन का अच्छा प्रभाव बनें इसमें सहायक होते हैं। सहज चर्चा में संगठन के प्रति सहानुभूति के शब्दों से समाज का सकारात्मक अभिमत बनाने का कार्य करते हैं। इनकी भी संगठन की प्रगति में अपनी भूमिका है।

कात्यायन सी तपस्या सभी संगठकों को करनी पड़ती है। अच्छा कार्य करते हैं तो विघ्नसंतोषी लोग विरोध भी करेंगे। संगठक को ऐसे लोगों से भी कुशलता से व्यवहार करना होता है। विरोध की धार बोथी हो ऐसा प्रयास करना होता है। जो दूरस्थ हैं वे निकट आएँ, सहानुभूति रखनेवाले सक्रिय हो, जो सक्रिय हैं वे नियमित हो यह तपस्या है। इसी के द्वारा संगठन में अधिक कार्यकर्ता जुड़ते हैं अर्थात कात्यायनी माता की कृपा होती है।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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8 Comments

  1. Karyakartao ke liye atyant upyogi margdarshan. Isse vaicharic spashtata nishcit badhegi. Vyapak drushtikon apnate hue adhik se adhik loga ko saath lekar chalne ka prayas badhega.

  2. Reblogged this on उत्तरापथ and commented:

    2011 में मा परमेश्वरन जी के सान्निध्य में नवरात्री के हर दिन एक आलेख लिखा था | ये है षष्ठी का आलेख

  3. संगठन कात्यायन ओर कार्यकर्ता जिन पर मां कात्यायनी की कृपा है जो मां कात्यायनी की तरह
    मातृ भूमि के दुश्मनों का नाश करने वाले है , मुझ जैसे सभी कार्यकर्ता चाहे किसी भी श्रेणी के हो अपने को अत्यधिक धन्य मान रहे है कि आप ने उन्हें महत्त्व दिया और किसी भी कार्य के सक्षम समझा ।
    संगठन यदि कार्यकर्ता पर विश्वास करता है और स्नेह करता है तो कार्यकर्ता अपना जीवन संगठन को समर्पित कर देता है यही इस भारत भूमि की परंपरा रही है।
    प्रणाम भाईसाहब 🙏 हम सभी धन्य है।

    • सादर प्रणाम ! सुंदर प्रस्तुति.
      आज भी जीजाबाई की कमी नहीं है वरना आप जैसे हजारों ज्येष्ठ श्रेष्ठ कार्यकर्ता समाज को नहीं मिल पाते.
      दूसरी और तीसरी परत की पहचान, प्रशिक्षण, प्रेरण और कार्य के लिए अग्रेषण का दायित्व आप जैसे ज्येष्ठ जनों का है. आपका दिन शुभ हो.
      राम राम

  4. अभी भी कुछ कार्यकर्ता है जो निस्वार्थ भाव से संघर्ष कर रहे हैं नियति के भरोसे….

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