आज नवरात्री का तीसरा दिवस – माँ चंद्रघंटा की पूजा। यह सभी दुर्गा के ही रूप है । अतः आज दुर्गा पूजा के संगठनात्मक रूपक को समझते है ।
नवरात्री का उत्सव शक्ति की पूजा का उत्सव है। वैसे तो सारे देश में आजकल जगह-जगह पर सार्वजनिक रुप से दूर्गा पूजा का उत्सव मनाया जाता है। उत्सवों का सामाजिक स्वरुप समाज को जोड़ने का कार्य करता है। कुछ नतद्रष्ट लोग अवश्य कहेंगे कि पूजा के नाम पर सारे असामाजिक तत्व चंदा इकट्ठा करते हैं और उत्सव के नाम पर केवल ध्वनिवर्द्धक यन्त्रों पर जोर-जोर से गाने लगाकर ध्वनि प्रदूषण के अतिरिक्त क्या होता है? समाज का सहभाग कहाँ है? कुछ मात्रा में बात में तथ्य भले ही हो किन्तु अपनी ऊर्जा को दुर्गा की पूजा में लगाने का कार्य युवाओं के लिये सराहनीय ही है। कम से कम दो बार आरती तो करते ही हैं। यदि कोई ठीक से मार्गदर्शन करें और साथ दें तो चमत्कार भी हो सकता है। कुछ साल पहले विवेकानन्द केन्द्र की ग्वालियर शाखा ने 129 दुर्गा पूजा समितियों का सर्वेक्षण कर दिवाली के बाद इन युवाओं का सम्मान किया। सम्मान में प्रत्येक पूजा समिति को भारतमाता का चित्र प्रदान कर आह्वान किया गया कि 31 दिसम्बर को वे उसी स्थान पर भारतमाता पूजन करें। 88 पूजा समितियों ने ना केवल यह किया, अपितु आगामी वर्षों में बिना किसी प्रोत्साहन के उसे निरन्तर परम्परा बना दिया। अतः किसी भी पृष्ठभूमि से आयोजन किया हो, युवा ऊर्जा के इस उदात्तिकरण का खुले मन से स्वागत ही होना चाहिए।
माता दुर्गा का अवतरण धर्म की संस्थापना के लिये हुआ। सभी देवताओं की शक्ति का वह संगठित परिणाम है। सब ने अपने-अपने शक्ति के अंश के साथ ही आयुध भी प्रदान किये। इस देवताओं की संगठित शुभशक्ति ने महिषासुर का संहार किया। इसलिये यह शारदीय नवरात्री पर्व शक्ति के साथ ही संगठन के तत्व की पूजा का भी पर्व है। माता दुर्गा संगठन की देवता है। अतः उनकी पूजा के इस महाव्रत में हम 9 दिन संगठन के भिन्न -भिन्न तत्वों की चर्चा कर उत्तरापथ की ओर से नवरात्री का अनुष्ठान करेंगे।
जन्म के पीछे निश्चित उद्देश्य होता है। वही अवतरण को मूल्य प्रदान करता है। धर्म की जब ग्लानी होती है तब असुर सशक्त होने के साथ ही प्रभावी भी हो जाते हैं। शासन की धुरा अधर्मियों के हाथ चली जाती है। शासन में आसुरिक तत्वों का बोलबाला हो जाता है। ऐसे में सुर तत्वों को सम्बल प्रदान करने, आत्मविश्वास के साथ संगठित करने के लिये अवतार प्रगट होते हैं। महाविष्णु के दशावतारों ने यही कार्य किया। वर्तमान समय में संगठन ही ईश्वरीय तत्व का अवतार है। भागवत महापुराण के अनुसार ‘संघे शक्ति कलाैयुगे।’ इस वचन में संघ के दो अर्थ हैं। एक है संख्याबल और दूसरा है संगठन। नवरात्री पूजन में पहला पुष्प है संगठन का उद्देश्य।
संगठन का उद्देश्य उदात्त होना अनिवार्य है। अन्यथा संकुचित स्वार्थों के लिये तो गुटबाजी व अपराध करनेवाले गिरोह ही एकत्रित आते हैं। भारत में प्रत्येक राष्ट्रीय संगठन की भूमिका भले ही भिन्न-भिन्न हो सबका सामान्य उद्देश्य धर्म संस्थापना ही होता है। वर्तमान में जब नकारात्मक और विनाशकारी तत्व आपसी तालमेल से षड़यन्त्र कर रहे हैं तब शुभशक्तियों का संगठन अत्यधिक आवश्यक है। उदात्तता का अर्थ है विस्तारित, ऊँचा व सर्वजन हिताय; संगठन का हेतु अथवा केन्द्रीय विचार इन तीनों लक्षणों से पूर्ण होना चाहिए। संगठन किसी छोटे समूह के हित में हो तो उसका स्तर सीमित ही होगा। अतः समाज की बड़ी से बड़ी सजीव इकाई के लिये कार्य करनेवाला संगठन अधिक प्रभावी रुप से ईश्वरीय कार्य कर सकता है। ऊँचे लक्ष्य का अर्थ है संगठन का गन्तव्य विराट होना चाहिए। सहज साध्य लक्ष्य के लिये उत्पन्न संगठन उद्देश्य की पूर्णता के बाद अनावश्यक हो जाते हैं और यदि विसर्जित ना कर दिये जाएँ तो आसुरिक हो जाते हैं। सम्भवतः इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखकर गांधी ने स्वतन्त्रता के बाद कोंग्रेस के विसर्जन का प्रस्ताव रखा था। संगठन प्रतिक्रियावादी होगा तो उसकी आयु व प्रभाव दोनों सीमित होंगे। अतः संगठन का प्रभावक्षेत्र सर्वव्यापी होना चाहिए। अतः तीसरा लक्षण सर्वजन हिताय। पर सभी संगठनों के लिये यह सम्भव नहीं हो पाता। ऐसे में कम से कम बहुजन हिताय तो होना ही चाहिए।

भैया आज पहली बार नवरात्रि को नयी द्रष्टि से देखा…ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था की नवरात्री राष्ट्र को संघठित करने का माध्यम भी बन सकती है…
लेकिन आजकल जो देखा जा रहा है वो ये है की नवरात्री का मतलब डांडिया खेलना ही रह गया है…जाहा देखो वही डांडिया हो रहा है…
ऐसा क्यों है की हम हर त्यौहार के वास्तविक अर्थो से दूर होते जा रहे है और केवल अपने आनंद तक ही सीमित होते जा रहे है ??? क्यों हम इस प्रकार के कुचक्रो को नहीं समझ पाते और जो दिखाया जाता है उसे ही सच मान लेते है???
डंडिया तो ठीक ही है| भावों का यहाँ तक की वासनाओं का भी इश्वराभिमुख होना अच्छा ही है| डिस्को से तो अच्छा ही है| और हम इन कार्यक्रमों में कुछ अपनी बातें जोड़ सकते है| जोधपुर में जब डंडिया का शुरू ही हाथ तब मई वहां था| हमने कुछ लोकसंगीत के कलाकारों से डंडिया के लय में देशभक्ति गीत मारवाड़ी में बैठाके केसेट निकलवा दी| बिलकुल व्यावासिक रूप से| कालूराम प्रजापति नाम था शायद गायक का| अब गुजरती के अलावा कोई गीत ही नहीं मिलते तो ये केसेट हाथों हाथ काम आ गयी| अभी पता नहीं क्या स्थिति है| शिकायत और आलोचना करने के स्थान पर जहाँ धर्म के नाम पर लोग इकठ्ठा हो रहे है वहां पर थोड़े प्रयास से सही सन्देश दिया जा सकता है उसका प्रयास करना चाहिए|
संघे शक्ति कलियुगे, जहाँ से लिया गया है, उस सूत्र का पुरा विवरण चाहिये श्री मान्? मिल सकता है क्या?
माँ चंद्र घटा को प्रणाम 🙏
कलयुगे संघ शक्ति ही श्रेष्ठ है।
प्रेरक संदेश