लोकमाता पुण्यश्लोक अहिल्याबाई

Mukul Kanitkar 4 मिनट का पठन

महिला नेतृत्व ही मानवता के समग्र कल्याण का मार्ग है। सर्वांगीण विकास भी प्रत्यक्ष महिलाओं अथवा नारीत्व के गुणों से परिपूर्ण नेतृत्व द्वारा ही संभव है। विकास में सदा अमर्याद स्वार्थ और संवेदनशीलता में द्वंद होता है। लोककल्याण में लापरवाही किए बिना आर्थिक प्रगति साधने हेतु मातृत्व से प्रेरित पुरोधा (अग्रेसर) आवश्यक है। इसी सिद्धांत से आज भारत में “नारी नीत विकास – women led developement” की बात हो रही है। भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के दसवें अध्याय विभूतियोग में कहते हैं – कीर्ति, श्री, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा ये छः गुण नारी में ईश्वरत्व के लक्षण है। ये सभी चरित्र के संस्कार जीवन के हर क्षेत्र में समाज को आगे ले जाने के लिए अनिवार्य है। इनसे प्रसादित नेतृत्व ही सफलता, यश के साथ ही उद्देश्यपूर्ण सार्थकता को प्राप्त करता है। 

युगसंधि के इस स्वर्णिम काल में पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर की 300 वी जयंती एक अनुपम अवसर के रूप में प्राप्त हुई है। नेतृत्व के सभी क्षेत्र और अनिवार्य संस्कारों का अनुपम उदाहरण अहिल्याबाई के जीवन में हम पाते हैं। जीजामाता के संस्कारों से छत्रपति शिवाजी महाराज के मन में प्रज्वलित अग्निशिखा हिंदवी साम्राज्य की उन्नत ज्वाला के रूप में सुप्रतिष्ठित हुई। महाराज का राज्याभिषेक केवल सत्ता परिवर्तन नहीं वरन् हिंदू राज्यव्यवस्था की पुनःस्थापना थी। जिस हिंदवी साम्राज्य ने आगामी अनेक शताब्दियों तक राष्ट्र की विजयचेतना को प्रेरित किया उसी राष्ट्रीय अस्मिता का आविष्कार होलकर संस्थान था। यही राष्ट्रीयता का संस्कार अहिल्याबाई के जीवन का आधार बना। युद्ध-सुरक्षा, प्रशासन, न्याय, उद्योग-व्यापार, आर्थिक नीति से लेकर मंदिरों के जीर्णोद्धार, आध्यात्मिक साधना तक सभी क्षेत्रों में अनुकरणीय नेतृत्व देवी अहिल्याबाई ने किया। त्रिशताब्दी आयोजनों में इस महान पुण्यात्मा के इन सभी पक्षों के साथ न्याय किया जा रहा है। प्रशासन में अनुशासन के साथ संवेदना का उदाहरण प्रस्तुत करनेवाली महारानी में न्याय में कठोर अनासक्ति का आदर्श प्रस्थापित करते हुए अपने पुत्र को मृत्युदंड देने का साहस भी विद्यमान था । इसीलिए वे लोकमाता है।

नगरनिर्माण का प्रादर्श इंदौर में प्रतिष्ठित करने के बाद नर्मदा किनारे पवित्र तीर्थस्थल महेश्वर में राजधानी स्थलांतरित करना केवल सांकेतिक नहीं था। उनके लिए राज्य स्वामित्व नहीं न्यासत्व था। छत्रपति शिवाजी महाराज को जीजामाता ने सीख दी कि ‘राज्य तो श्री का है।’ वही संस्कार हिंदवी स्वराज्य में स्थायी हुआ। अहिल्याबाई भी अपने सभी राज्य आदेशों पर शिव-शंकर अंकित करती थी। राज्य तो ईश्वर का है और राज्यकर्ता तो मात्र न्यासी प्रबंधक है, यह धर्मराज्य की व्यवस्था अहिल्याबाई ने सुस्थापित की। पूरे देश में मंदिरों, धर्मशालाओं और अन्य तीर्थयात्रा सुविधाओं का निर्माण जहाँ एक और उनकी व्यापक राष्ट्रदृष्टि स्पष्ट करता है वहीं इस कार्य में व्यक्तिगत धन का ही प्रयोग करना उनके वित्तीय शुचिता और अनुशासन का द्योतक है। इस धार्मिक कार्य में राजकोश का प्रयोग ना करना वर्तमान सेक्युलर राज्य का भारतीय प्रतिमान है। 

नारी सम्मान के विषय में मनुस्मृति के श्लोक का संदर्भ बार बार दिया जाता है 

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ मनु ३.५६ ॥

जिस कुल/परिवार में नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता प्रसन्नता से रमते हैं और जहाँ नारी का सम्मान नहीं होता वहाँ सभी धर्मकार्य फलहीन हो जाते हैं। 

यह श्लोक विवाह और परिवार के संदर्भ में आता है इसलिए परिवार की बात की है किंतु समाज, राष्ट्र, संस्था, संगठन, कार्यस्थल सभी पे यह लागू होता है। पूजा शब्द का व्युत्पत्तिशास्त्र के अनुसार अर्थ होता है — पूजित के समान हो जाना – पुनरेव जायते इति पूजा। भगवान राम की यथार्थ पूजा उनके जैसा होने अर्थात् उनके चरित्र के गुणों को आत्मसात करने में हैं। पूजा का व्यावहारिक अर्थ हुआ अनुसरण अथवा अनुकरण। इस आधार पर प्रस्तुत श्लोक का भावार्थ ही बदल जाता है। जहाँ नारी का अनुसरण किया जाता है अथवा नेतृत्व माना जाता है वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं। नारी का नेतृत्व तथा नेतृत्व में नारी के विशेष गुणों का प्रभाव यही कल्याणकारी नेतृत्व की कुंजी है। इसी से भारत अपने समर्थ काल में विश्वगुरु था, है और रहेगा। पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई की जीवनी के माध्यम से महिला नेतृत्व का यह विचार समाज में पुनःप्रतिष्ठित हो यही विनम्र अभीप्सा . . . 

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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2 Comments

    • युग परिवर्तन के कालखंड को युगसंधि कहते हैं। भारत में अभी अपनी शक्ति के पुनः प्रतिष्ठापन का स्वर्णयुग प्रारंभ हो रहा है। दासता से आत्मबल के परिवर्तन की यह संधि है।

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