किसी भी संगठन में सदस्यता विस्तार का बड़ा मापदंड होता है। जन संगठनों में संख्याबल का महत्व अधिक होने के कारण सदस्यता अभियान महत्वपूर्ण हो जाते है। भागवत में जब भिन्न भिन्न युगों की शक्ति का वर्णन किया तब कहा – संघे शक्ति कलियुगे। यह संख्याबल की ही बात हो रही है। वैधानिक रूप में भी पंजीकृत संस्था (Registered society) में सदस्यता का महत्व होता है। किंतु वैचारिक अथवा शैक्षिक कार्य में संलग्न संगठनों में सदस्यों की संख्या से अधिक उनकी क्षमता, गुणवत्ता और पात्रता महत्वपूर्ण होती है। ऐसे संगठनों में अधिक सदस्य बनाने के स्थान पर कार्य के अनुरूप योग्यता रखनेवाले सही सदस्य बनाना अधिक आवश्यक होता है। इसी कारण केवल आर्थिक शुल्क लेकर वैधानिक सदस्य बनाने के स्थान पर संगठन के साथ वैचारिक और भावात्मक संबंध स्थापित करा सदस्य बनाना अधिक प्रभावी होता है।
सेवाभावी संगठनों का सदस्यता शुल्क सामान्यतः न्यूनतम ही होता है। इस कारण प्रभावी कार्यकर्ताओं द्वारा सामान्य सूचना पर ही अनेक सदस्य बन सकते है। ऐसे व्यक्ति अनेक संस्थाओं के सदस्य होते हैं और उन्हें यह भी ठीक से ज्ञात नहीं होता कि जिस संगठन के वे सदस्य है उसके लक्ष्य, कार्य और उद्देश्य क्या हैं ? वे तो केवल किसी के कहने पर उसके आग्रह से नाममात्र शुल्क प्रदान कर विश्वास से ही सदस्य बन गये होते है। ऐसे वैयक्तिक संबंधों द्वारा हुए सदस्यता अभियान में कई बार सदस्य शुल्क की पावती (receipt) भी नहीं लेते है। यह वास्तव में आभासी सदस्यता है। संगठन के विचार से सहमत होकर बने सदस्य ना होकर केवल व्यक्तिगत प्रभाव से बने सदस्य हैं।

जनसंगठन में विचार से अधिक विचारधारा का प्रभाव होता है। ऐसे संगठन की अपने क्षेत्र में एक छवि होती है। संगठन राष्ट्रीय विचारधारा को मानता है या वामपंथ को या किसी अन्य राजनैतिक विचारधारा से उसका जुड़ाव है यह लगभग स्पष्ट होता है। उस संगठन के नेतृत्व, नारे, कार्यक्रम, आंदोलन आदि से उसकी विचारधारा समाज में प्रकाशित होती है। अतः ऐसे संगठनों में सदस्यता इस झुकाव के कारण होती है। सघन और गतिमान अभियान में ऐसे संगठन प्रतिवर्ष सदस्यता सप्ताह अथवा पक्ष मनाकर विशाल समुदाय को आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। यह उनकी कार्यशैली तथा संगठनात्मक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अनिवार्य आवश्यकता भी होती है।
वैचारिक अथवा शैक्षिक संगठन में सदस्यता की संख्या से अधिक उसकी गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है। अतः चुन चुन कर सदस्य बनाना अपेक्षित है। केवल व्यक्तिगत प्रभाव अथवा सम्पर्क, आग्रह के स्थान पर क्रमशः स्थापित वैचारिक अधिष्ठान ही सदस्यता का आधार बनना चाहिए। केवल विचारधारा का झुकाव पर्याप्त नहीं है। संगठन का समग्र विचार, कार्यक्षेत्र, लक्ष्यवर्ग, कार्य प्रणाली, कार्यपद्धति तथा कार्यशैली को समझकर जो व्यक्ति संगठन का सदस्य बनता है वह केवल शुल्क की राशि ही नहीं अपितु अपना अमूल्य नियमित समय, योग्यता, विशेषज्ञता, ज्ञान, विद्वत्ता आदि का भी समर्पण संगठन के लिए करता हैं। वैचारिक संगठन के लिए केवल भावनात्मक सम्बल (Moral Support) देनेवाले सदस्यों से अधिक प्रत्यक्ष शैक्षिक योगदान देनेवाले सदस्य आवश्यक हैं। ऐसे संगठनों की सदस्यता सभी के लिए सहज सुलभ ना होकर विशेष प्रयास से प्राप्य पुरस्कृत छवि की हो।
इसी कारण संगठन विकास और विस्तार के सूत्रों में सदस्यता का स्थान संपर्क, संवाद, सूचना और संबंध के बाद पाँचवें स्थान पर हैं। सतत संपर्क और संवाद के बाद जब सूचनातंत्र से प्राप्त समयबद्ध संकेतों से आयोजनों और नित्य बैठकों ने सहभाग प्रारंभ हो जाता है तब संगठनात्मक संबंध स्थापित होता है। अब ऐसा साथी कार्यकर्ता संगठन के विचार, कार्य, कार्य प्रणाली, पद्धति और शैली से भलींभाँति परिचित हो जाता है और स्वयं ही संगठन से जुड़ने को उत्सुक हो जाता है। तब उसे वार्षिक अथवा आजीवन सदस्य बनाया जा सकता है। जहां तक संभव हो प्रथम सभी को वार्षिक सदस्य बनने के लिये ही प्रेरित किया जाना चाहिए। प्रतिवर्ष इसका नुतनीकरण अनिवार्य होता है। दो-तीन वर्ष जुड़े रहने के बाद बिना पुनःस्मरण के जब वह कार्यकर्ता नवीनीकरण करने लगता है तब उसे आजीवन सदस्यता के लिए पात्र मानना चाहिए। आजीवन सदस्य केवल शुल्क का नहीं अपितु समय का भी योगदान संगठन में देता है। केवल आर्थिक सहयोग से जुड़ने के इच्छुक व्यक्तियों को सदस्य बनाने के स्थान पर नियमित दानदाता बनाना अधिक उचित है।
वार्षिक और आजीवन सदस्यता एक व्यक्ति की सदस्यता का माध्यम है। इसके प्रतिफल में संतोष और कार्य में योगदान के अतिरिक्त कोई अपेक्षा नहीं होती। यह बात भी सदस्य को स्पष्ट करना आवश्यक है। स्वयंसेवी संगठनों में सदस्यों अथवा कार्यकर्ताओं को कोई विशेष अधिकार अथवा प्रावधान नहीं मिलते अपितु केवल कर्तव्य और दायित्व ही अपेक्षित किए जाते हैं। इसलिए सदस्य बनने से क्या मिलेगा इस प्रश्न का कोई भौतिक उत्तर नहीं है। सदस्य बनकर क्या करना है इसका अवश्य स्पष्ट उत्तर दिया जा सकता हैं। क्योंकि वैचारिक/शैक्षिक संगठन में सदस्यता केवल औपचारिकता नहीं है अपितु संगठन के ध्येय हेतु कार्य करने का संकल्प है। हर सदस्य का ठोस योगदान अपेक्षित है।

शिक्षा क्षेत्र में कार्य करनेवाले संगठनों में परिवर्तन की एक इकाई शिक्षा संस्थान भी होते हैं। अतः व्यक्तिगत सदस्यता के साथ ही संस्थागत सदस्यता का प्रावधान भी होता है। जो विद्यालय या महाविद्यालय संस्था के रूप में संगठन का सदस्य बनता है उससे संगठन के विचार के अनुरूप परिवर्तन करने होते हैं। संगठन द्वारा प्रतिपादित सुधारों पर प्रयोग भी इन सदस्य संस्थाओं में किए जाते हैं। अपेक्षा होती है कि ये संस्थाएँ समाज में आदर्श प्रस्थापित करें। संगठन का ध्येय प्रत्यक्ष व्यवहार में लाने योग्य है इसकी जीवंत साक्ष्य संस्थागत सदस्य प्रदान करते हैं। सदस्य संस्थाओं द्वारा केवल निर्धारित शुल्क भर देने से कार्य नहीं होता अपितु संरचनात्मक, संस्कारात्मक तथा कार्यक्रम में परिवर्तन भी करने होते हैं। संस्था के सदस्य बनने के बाद भी उसमें कार्यरत शिक्षक अथवा अन्य कर्मचारी अपनी रुचि के अनुसार व्यक्तिगत सदस्य बन सकते हैं।
संपर्क, संवाद, सूचना और संबंध से जुड़े कार्यकर्ता को वैधानिक तथा भावात्मक रूप से परिवार का अंग बनाने का नाम है सदस्यता। जैसे नवजात शिशु के नामकरण का हर्ष से उत्सव मनाते वैसे ही एक एक सदस्य के आगमन का भी उल्हास से स्वागत होना अपेक्षित है। ताकि सदस्यता बनें एक अविस्मरणीय सम्मान।

ॐ,
संघे शक्ति कलियुगे। ये सनातन धर्म का उपयोगी मंत्र है। मतभेद रहे लेकिन सनातनियों के बीच मनभेद नहीं रहना चाहिए।
हम सब एक हैं।
संगठन विस्तार मै कार्यकर्ता का निर्माण एक समग्र प्रक्रिया है। जिसमें सम्पर्क, सम्बन्ध, अधिष्ठान के प्रति वैचारिक झुकाव, संगठन की कार्य पद्धति की समझ पूर्ण रुप से विकसित होना तथा संगठन के कार्यों मै निष्ठापूर्वक संलग्नता अपेक्षित सोपान है। किन्तु कार्यकर्ता निर्माण की इस सम्पूर्ण प्रक्रिया मैं एक लम्बा कालखण्ड लगता है। साथ ही सम्पर्क करनेवाले कार्यकर्ता की वैचारिक प्रष्ठभूमि का भी बहुत प्रभाव होता है। क्या सम्पर्क,और प्रगाढ़ सम्बन्ध बन जाने पर यदि वैचारिक झुकाव स्पष्ठ दिखता है, तो उसे सदस्य बनाकर दायित्व के साथ योग्य वैचारिक योद्धा के रूप मै विकसित होने का समय एवं अवसर देना चाहिए।
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