संगठन का जीवंत होना उसके सतत विस्तार और विकास पर निर्भर करता है। स्थिर होते ही जैसे जमा जल में सड़न उत्पन्न होती है वैसे ही संगठन भी सतत आगे ना बढ़े तो धीरे धीरे अप्रभावी होने लगता है। अतः कार्यकर्ताओं को संगठन के विस्तार और दृढीकरण पर नित्य कार्य करते रहना होता है। किसी भी स्थिति में इसमें शिथिलता नहीं आ सकती। कोई भी विस्तार पर्याप्त है ऐसा नहीं मान सकते । यह तथ्य सभी प्रकार के संगठनों के लिए लागू होता है। जैसे जीवित शरीर में सतत नूतन कोशिकायें बनती रहती है वैसे ही संगठन के अंग और अंतिम इकाई कार्यकर्ता भी सतत जुड़ते रहना आवश्यक है। जनसंगठनों के स्वभाव के कारण उसकी गतिविधियाँ और सहभागी सदस्यों के व्यक्तिगत हित भी जुड़े होने से यह बड़ी मात्रा में होता है। वैचारिक संगठनों में विशिष्ट योग्यता के कार्यकर्ता अपेक्षित होने तथा व्यक्तिगत हित के स्थान पर समष्टिगत लक्ष्य केंद्र में होने के कारण कार्यकर्ता निर्माण पर विशेष ध्यान देना होता है। इसी प्रक्रिया का सोपानशः चरणबद्ध चिंतन इस आलेख माला किया जा रहा है।

१. सम्पर्क – विभिन्न कार्यक्रमों, आयोजनों तथा संगठन की सहज प्रक्रिया में ही अनेक नूतन व्यक्ति सम्पर्क में आते है। कार्यकर्ता तथा दायित्ववान अधिकारियों को इन सम्पर्कों से योजनापूर्वक मिलना होता हैं। यह सम्पर्क का प्रथम चरण है। इसमें नूतन व्यक्ति का पूर्ण परिचय प्राप्त करना उनके साथ अनौपचारिक संवाद स्थापित करना अपेक्षित है। व्यक्तिगत सम्पर्क भी आवश्यक है किंतु चमूमें किया सम्पर्क अधिक परिणामकारी होता है। २ या ३ कार्यकर्ताओं का दल बना कर नूतन सम्पर्कों के पास जाना उन्हें संगठन से अधिक जोड़ता हैं। गृहसम्पर्क में परिवार के साथ भी परिचय होता है।
शिक्षा जगत में कार्यरत संगठन में संस्थान में जाकर सम्पर्क करना अधिक उत्पादक हो सकता है क्योंकि एक से मिलते समय उनके अन्य सहयोगियों से भी परिचय होता है और आगे के सम्पर्क की नीव पड सकती है। नूतन जुड़ाव तो सम्पर्क का प्रारंभ मात्र है। वह व्यक्ति जुड़े तब भी सम्पर्क आगे बढ़ेगा और ना जुड़े तब भी प्रयत्न तो जारी रहेगा। सम्पर्क जितना अनौपचारिक होगा उतना ही आनंददायी होता है। मित्रता का प्रारंभ सम्पर्क में होता है। कार्यक्रमों से प्राप्त सूची के साथ ही हमारी व्यक्तिगत मित्र सूची और आजकल अपने चलदूरभाष की क्रमांक सूची (Phone-Book) भी नूतन सम्पर्क की खदान है। ‘अ’ से प्रारंभ कर पूरी सूची का अवलोकन कर प्रतिदिन कुछ नामों का चयन कर सम्पर्क करना चाहिए। आज सम्पर्क के अन्यान्य साधन उपलब्ध है। उनका सविवेक उपयोग उचित है किंतु प्रत्यक्ष मिलने जैसी पारम्परिक विधि ही सर्वाधिक प्रभावी है।
संदेश द्वारा सूचना दी जा सकती है किंतु उसे सम्पर्क नहीं कहेंगे। दूरभाष पर प्रत्यक्ष बात उससे अधिक निकट का सम्पर्क है। गत कुछ वर्षों में सीधे चलचित्रित साद (video call) भी प्रचलित है। केवल वार्ता के स्थान पर जीवित चित्र देखते हुए की गई बातचित प्रत्यक्ष के अधिक निकट होती है किंतु फिर भी सीधे मिलने का स्थान नहीं लें सकती। अतः स्वास्थ्य की सावधानियों का पालन करते हुए अधिकाधिक प्रत्यक्ष सम्पर्क करना चाहिए। नूतन परिचित को कार्यालय अथवा अपने निवास पर बुलाने से भी उनका संगठन से जुड़ाव बढ़ता है। जब हम उनके घर अथवा कार्यस्थल पर जाकर सम्पर्क करते हैं तो उन्हें अधिक महत्व एवं आत्मीयता का अनुभव होता है। इन सभी स्तरों के सम्पर्क का उपयोग कार्यकर्ता को संगठनात्मक विवेक से करना होता है। चलदूरभाष के प्रचलन से पूर्व सूचना के साथ सम्पर्क होता था । ऐसा सूचनासम्पर्क आज भी आवश्यक है ही। जब विवाह निमंत्रण जैसी सूचनाएँ भी संदेश के द्वारा निर्वैयक्तिक हो गई है तब कभी कभी अचानक अहेतुकी भेंट अधिक मित्रतावर्द्धक हो सकती है। भक्ति में ईश्वर की कृपा को अहेतुकी कहा जाता है। क्योंकि ईश्वर तो अपेक्षा नहीं करता इसी प्रकार कार्यकर्ता द्वारा बिना किसी अपेक्षा के किया गया सम्पर्क अत्यंत परिणामकारी होता है।
सम्पर्क प्रत्येक कार्यकर्ता का नित्य कार्य है। कोई भी दिन इसके बिना नहीं हो सकता। संकल्प के साथ संपर्क करने से वह साधना बन जाती है। संगठन का तो विस्तार होता ही है पर उससे भी महत्वपूर्ण है कि संपर्क से कार्यकर्ता के व्यक्तित्व का विकास होता है। इसलिए स्वयं के लिए, संगठन के लिए और उससे भी आगे राष्ट्र निर्माण के लिए संपर्क का अभ्यास हो जाना अनिवार्य है।
